RED CARD VIEWs : 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़

RED CARD VIEWsDr. Piyush Saxena

 

 

 

 

 

 

100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़ 100 करोड़

तीन दिन से अखबार और न्यूज़ चैनल इस संख्या से भरे पड़े हैं। आरोप है कि भाजपा देना चाहती है और कांग्रेस जेडीएस के विधायक लेना नहीं चाहते। भाजपा कहती है कि हमने रुपए देने जैसी कोई बात नहीं की, जिसको वोट करना है वह अंतरात्मा की आवाज पर वोट करे। वह यह नहीं बताती कि वह जातिगत आधार पर लिंगायतों को अपील कर रही है। प्रश्न यह है कि क्या ज्यादा ताकतवर है? रुपया, जाति दोनों का मिश्रण या फिर विचारधारा जीत जाएगी।  संविधान कहता है कि एक बार आप किसी राजनीतिक दल से विधायक बन गए तो फिर आपकी अंतरात्मा की आवाज कमजोर हो जाएगी और तभी मजबूत होगी जब आप एक तिहाई विधायकों के साथ पार्टी तोड़ दें।

अब इस खबर की जड़ में जाएं तो पाएंगे कि बात शुरू कहाँ से हुई? कुमारस्वामी व उनके दो विधायकों ने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं ने उन्हें 100 करोड़ का ऑफर दिया। ठीक है पर तीनों में से कोई भी उन नेताओं को नाम नहीं बता सके। किसी ने फोन कॉल रिकॉर्ड करने की जहमत नहीं उठाई। कोई सबूत नहीं। तो फिर जनता कैसे मान लें?  कुमारस्वामी और उन दो विधायको की क्या विश्वसनीयता है? और यदि उनकी विश्वसनीयता है तो प्रकाश जावड़ेकर ,येदियुरप्पा की क्यों न हो जो देश की 67% जनता के प्रतिनिधि हैं।

विचारणीय यह भी है कि यदि रिश्वत की पेशकश की गई है तो लोकतंत्र के चीर हरण की दोषी भाजपा है परंतु यदि रिश्वत की बात ही नही हुई और फिर भी खरीद फरोख्त का आरोप लगा तो फिर लोकतंत्र को बदनाम करने का दोषी कौन?

विचारणीय यह भी है कि यदि भाजपा विधायक खरीदना चाहती है तो फिर कुछ विधायक बिकना भी तो चाहते होंगे… यदि पार्टी अपने ही विधायकों को नजरबंद करके रखती है तो इसका मतलब है कि वह स्वयं अपने विधायकों पर विश्वास नहीं करती। वह मानती है कि उसके विधायक अपने विचारधारा के प्रति निष्ठावान नहीं है, वे बिकाऊ हैं और उन्हें स्वतन्त्र निर्णय लेने  से रोका जाए। क्या विधायक बनने के बाद व्यक्ति को रोबोट बन जाना चाहिए और अपने नेता और उसके परिवार का ग़ुलाम हो जाना चाहिये?

प्रश्न यह भी है कि जिन लोगों पर खुद पार्टी को विश्वास नहीं उन्हें टिकट देकर जनता के सामने क्यों भेजा? जिन पर पार्टी को विश्वास नहीं जनता क्यों उन पर विश्वास करेगी?

और एक आखरी बात, आजादी के 71 साल बाद भी हमारे सांसदों ने कभी नियम क्यों नहीं बनाए कि खंडित जनादेश में सरकार बनाने के लिए पहले किसे आमन्त्रित किया जाए।हमारी संसद में यह  क्षमता नहीं है या मंशा नहीं है आप बेहतर जानते हैं।

@newsbiryani.com

(*लेखक के निजी विचार हैं और असंपादित रूप से प्रकाशित , पाठक तथ्यों की पुष्टि स्वयं के विवेक से करें)