क्या छाछ से शांत होंगे किसान ??

  RedCard Views by- Dr. Piyush SaxenaL

मप्र के विभिन्न जिला प्रशासनो की मेहरबानी है कि फसल खरीदी के समय मंडियों में छाया, हवा, पानी, छाछ, पना की व्यवस्था करने के निर्देश तीन दिन पहले जारी कर दिए गए। हकीकत यह है कि विदिशा शहर से लगी हुई मंडियों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं देखी गई, न ही सम्बंधित अधिकारियों ऐसे कोई निर्देशों की कोई जानकारी है।एक तो पहले ही किसानों की  यह चिंता तब की गई जब एक वयोवृद्ध किसान मूलचंद को अपनी जान गंवानी पड़ी। फसल खरीदी के अब सिर्फ 12 दिन शेष हैं पर अब भी छाछ पना तो दूर किसान टैंकरों में भरा गर्म गन्दा पानी पी रहे हैं।

अब लीपापोती भले ही की जाए पर स्थानीय प्रशासन की लापरवाही और बदइंतजामी  का गुस्सा दरअसल शिवराज सरकार को झेलना पड़ेगा।

चुनाव अंततः राजनीतिक दल लड़ते हैं कर्मचारी नहीं। किसी भी सरकार के आने जाने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

यदि कर्मचारी-अधिकारियों की कारगुजारी से वर्तमान सरकार विपक्ष में पहुंच गई तो भी अधिकारी तो नए आकाओं की आवभगत में लग जाएंगे भाजपा जरूर हाथ मलती रह जाएगी पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

एक प्रश्न और मन मे उठता है कि एक तो पहले ही ये इंतजाम किसानों के प्रति चिंता के भाव से नहीं बल्कि  एक जून से होने वाले किसान आंदोलन के भय से किये गए थे पर फिर भी उन्हें अमली जामा नहीं पहनाना एक तरह से प्रशासनिक विफलता और किसानों को और भड़काने की साजिश के रूप में नजर आता है।

कायदे से ये इंतजाम तो वयोवृद्ध किसान की मृत्यु के पहले  ही हो जाने थे और उस बदनसीब किसान की मृत्यु होनी ही नहीं थी, पर अब भी शिवराज की चिंता के बावजूद स्थानीय प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगी।

चूंकि प्रशासन स्वयं ही किसानों को sms करके आमन्त्रित करता है, इसलिए कम से कम उन्हें जीवित रखने और उनकी फसल बचाने लायक इंतज़ाम तो उन्हें करना ही चाहिए।

इतनी पढ़ाई, प्रशिक्षण और अनुभव के बाद भी यदि हम अपने बुलाये हुए अतिथियों के लिए छाया, हवा, भोजन पानी की व्यवस्था नहीं करते तो लापरवाही और संवेदनाशून्यता का आरोप गलत भी नहीं।

क्या प्रशासनिक अधिकारी इस देश के किसान को मनुष्य ही नहीं मानते या यह बदइंतजामी,  किसी सोची समझी साजिश के तहत जनता को शिवराज सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए की जाती है?

पर संवेदनाशून्य होने का आरोप सिर्फ प्रशासन पर ही क्यों ? किसानों को अपना सबसे बड़ा वोट बैंक मानने वाले  राजनीतिक दलों ने भी पहले से इन इंतजामों की कोई जांच नहीं की। उस किसान की मृत्यु के बाद भी घटिया व्यवस्थाओं के लिए दोषी अधिकारियों पर तगड़ी कार्यवाही का किसी राजनीतिक दल ने दवाब नही बनाया।अब भी किसानों की मदद के लिए भाजपा अथवा कांग्रेस की ओर से प्रशासन पर कोई दवाब नहीं है।

प्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। यदि भाजपा अथवा कांग्रेस का किसान मोर्चा  आने वाले किसानों के लिए अपने बैनर के तले, टेंट लगाकर अपनी ओर से पानी, गद्दे, कूलर की व्यवस्था कर लेता तो यकीन मानिए फालतू की भाषणबाजी की अपेक्षा किसान इस सेवा से ज्यादा प्रभावित होता और संबंधित राजनीतिक दल की तरफ झुकता।

सौ बड़ी बड़ी बातों की अपेक्षा जमीन पर किये गए दो ठोस कार्य मतदाताओं को ज्यादा प्रभावित करते हैं।

जाने दीजिए.. देर आये दुरुस्त आए। अब तो स्थानीय प्रशासन ने गर्मी से किसानों को बचाने के निर्देश जारी कर दिए हैं पर भी सब जानते हैं कि खरीदारी पूर्ण होने से पहले ही आंधी और बारिश का हमला होगा,भगदड़ मचेगी, फसल भीग जाएगी, लेकिन उसके लिए अभी से कोई इंतजाम नहीं किये गए हैं। उन व्यवस्थाओं के लिए एक और किसान की बलि लगेगी।

समस्या यह है कि अधिकारी  किसान को मैले कुचैले कपड़े और पसीने से भीगे शरीर से आंकते हैं और राजनीतिक दल उसे एक भीड़ मानते हैं जिसे अपने फायदे नुकसान के हिसाब से या तो भड़का दिया जाता है या पुचकार लिया जाता है।

वे भूल जाते हैं कि उसी पसीने से उगे अन्न से मानवता जीवित है और उसी मैले कपड़े को किसान जब झंडा बना लेता है तो तख्त बदलते देर नहीं लगती।

सरकार और संगठन में बैठे शीर्ष नेतृत्व को यह बात समझना होगी कि उनके द्वारा बनाई गई जनकल्याण की योजनाएं तब तक लोगों को प्रभावित नहीं करेंगी जब तक कि जमीनी स्तर पर प्रशासन उन्हें अमली जामा नहीं पहनाता जिसमे की स्थानीय प्रशासन लगभग फेल है या ग्रेस से पास हो रहा है। नीति आयोग के आंकड़े यह बात स्पष्ट तौर पर बताते हैं।

प्रशासन पर नजर रखिये।स्थानीय जनप्रतिनिधियों और स्थानीय संगठन को सशक्त और उत्तरदायी बनाइये। संगठन का कार्य महज बैठक, सभा और भाषणबाजी नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें इस बात पर भी कड़ी नजर रखनी चाहिए कि स्थानीय प्रशासन चुस्त दुरुस्त और जागा हुआ है या नहीं?

सबको याद रखना होगा कि चुनाव सिर्फ शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ को नहीं लड़ना है बल्कि हर राजनीतिक दल के हर कार्यकर्ता, हर पदाधिकारी को भी जनता के समक्ष झोली फैलाना होगी।ऐसा न हो कि झोली में सिर्फ झिड़कियां ही आएं……