भाजपा ने गिराई खुद की सरकार, कांग्रेस असंमजस में…
RED CARD VIEWs : Dr. Piyush Saxena

कश्मीर में भाजपा पीडीपी सरकार गिर गई। क्यों गिरी, कैसे गिरी, इसके पीछे की राजनीति क्या है और इसके आगे का प्लान क्या है इस सब पर लम्बी चर्चा अपेक्षित है, होनी भी चाहिए पर आश्चर्यजनक रूप से भाजपा खेमे में खुशी की लहर और सन्तोष का भाव है और विपक्ष रूठा रूठा नजर आ रहा है, जबकि होना इसका उलट था।

ऐसा ही कुछ उस समय हुआ था जब प्रणब दा ने संघ के कार्यक्रम में जाने का न्यौता स्वीकारा था। होना तो यह था कि जब संघ के सरसंघचालक ने काँग्रेस में अपनी उम्र खपा देने वाले प्रणब दा को आमंत्रित किया था तो विरोध के स्वर संघ के भीतर से उठने चाहिए थे लेकिन हुआ इसका उलट। संघ भाजपा या उससे जुड़े किसी भी संगठन ने इस निर्णय के विरुध्द न तो कोई आवाज उठाई और न ही उस पर कोई विचार किया। इसे आप अनुशासन भी कह सकते हैं, अपने नेता पर पूर्ण विश्वास या उदारवादी सोच लेकिन कांग्रेस की प्रतिक्रिया को क्या कहेंगे जिन्होंने सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक अपने ही सर्वोच्च श्रेणी के नेता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। एक पूर्व राष्ट्रपति की गरिमा का ध्यान भी नही रखा और उन्हें कोसने के चक्कर मे सेल्फ गोल करते रहे। प्रणबदा संघ के मंच से क्या कहेंगे इसका भय जितना कांग्रेस को था उतना ही भाजपा को भी रहा होगा, पर भाजपा अपने भय को दबाकर  अपनी गम्भीरता को ओढ़े बैठे रहे और अपने आपको राजनीतिक रूप से परिपक्व साबित करने में सफल रही, जबकि कांग्रेस के नेता इसमे मात खा गए। उनका भय उनकी चिंता उभर कर सामने आ गई। यह बात इसलिए और भी बुरी है क्योंकि प्रणबदा संघ के नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे हैं। जाहिर तौर पर कांग्रेसियों को उन पर अधिक विश्वास रखना चाहिए था बनिस्पत संघ के।
अब बात आई जम्मू कश्मीर की, जहाँ भाजपा समर्थित यह पहली सरकार थी, काश्मीर को पहली महिला मुख्यमंत्री मिली थी पर यह रिश्ता बड़ा असहज था। एक प्रयोग था कि कैसे दो विपरीत विचारधारा के राजनीतिक दल अपनी अलग सोच सोच के साथ अपने अपने वोट बैंक को साधते हुए अपने राष्ट्रीय और प्रादेशिक एजेंडा को पूरा करते हैं? प्रयोग पूर्णतः सफल नही रहा।
इस पूरे मामले में भी विचारणीय बात यह थी कि न तो सरकार बनाते वक्त भाजपा के किसी कोने से कोई विरोधाभास देखने को मिला और न ही सरकार गिरने के बाद ऐसी कोई बात हुई। विपक्ष जरूर पहले सरकार बनाने का औचित्य पूछता रहा और अब सरकार गिरने पर भी दुःखी है। उसमे भी अलग अलग विचार हैं, अलग अलग शंकाएं हैं।
इस पूरे मामले में कांग्रेस की चिंता यह है कश्मीर मामले में वह भाजपा पर लगातार सत्तालोलुपता का आरोप लगाती रही है और कश्मीर की दुर्दशा के लिए गठबंधन सरकार को दोष देती रही है पर समर्थन वापस लेकर भाजपा ने कांग्रेस से ये दोनों मुद्दे छीन लिए हैं।यदि समय के साथ कश्मीर की स्थिति में सुधार आया तो इससे मिलने वाला श्रेय भाजपा को 2019 में बेहद मजबूत स्थिति में ले आएगा।
आम जनता ने इस कदम का स्वागत किया है, राजनीतिक हलकों में इसे लेकर असमंजस है और अलगाववादियों के मन मे चिंता है।
क्या परिणाम निकलेंगे यह तो समय के गर्भ में है पर मोदी शाह की जोड़ी अपने निर्णयों से विपक्ष को लगातार भरमाने, चौंकाने और हड़बड़ाने में सफल रही है जो राजनीति के क्षेत्र में सही रणनीति मानी जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि कांग्रेस को अपनी प्रतिक्रिया बेहद सोच समझकर, अनुशासित तरीके से और एक ही लाइन पर देनी होगी। यह न हो कि भाजपा विरोध के चक्कर मे विपक्ष राष्ट्रविरोधी नजर आने लगे…. 2019 करीब ही है…