( भोपाल/  मंदसौर/ नागपुर से नीरज ओमप्रकाश श्रीवास्तव की रपट )

मालवा अंचल में भड.की किसान आंदोलन की आग से इस बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अपना दामन बचा पाना मुश्किल जान पड. रहा है. ये बात आईने की तरह साफ है कि गोलियां शिवराज सिंह नें न तो स्वयं चलाईं और न ही गोली चलाने के आदेश दिये. लेकिन प्रदेश की संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत राज्य में सत्ता के सबसे शीर्ष पद पर विराजमान रहकर श्री शिवराज सिंह नें ऐसी तमाम् कूटनीतिक गलतियों को अंजाम दिया है कि राज्यभर में उनके नेतृत्व को लेकर जो असंतोष पनपा है उसकी आग से दामनबचा पाना नामुमकिन है. शिवराज सिंह के प्रति आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का इस प्रकार संज्ञाशून्य हो जाना अनेक चिंताओं का कारण बन गया है.संघ की दुविधा है कि उनके पास शिवराज सिंह से योग्य कोई है नहीं सो  भारतीय जनता पार्टी के पारंपरिक शुभचिंतक वोटबैंक का खिसकना अगले आम चुनाव में शिवराज के रहते भाजपा और संघ को जो नुकसान पहुँचायेगा जिसकी भरपाई करनें में दशकों लग जायेंगे.

images (3)बीते दिनों मंदसौर ,देवास, भानपुरा, उज्जैन ,ग्वालियर समेत राज्यभर में तेजी से किसानों की समस्याओं को लेकर जो आंदोलन परवान चढा. वह तीव्र हिंसात्मक हो गया . कई जानें गईं. कानून व्यवस्था पर श्री शिवराज सिंह की ढीली पकड. ने राज्य के सबसे मृदुभाषी और सत्कार भावी माने जाने वाले मालवा अंचल की कीर्ति को ध्वस्त करके रख दिया. लाखों लोग परेशान हो गये  परिवहन और कानून व्यवस्था भंग हो गई. और तो और आगजनी में करोडों की संपत्ति का अपूरणीय नुकसान हुआ.हिंसा की आग में मालवा झुलसता रहा और मुख्यमंत्री मरनेवालों के परिजनों को दिये जाने वाले अनुदान की राशि बढाते रहे.

 18921833_1542136362463096_2297028769639835079_nकिसान आंदोलन के दौरान लूटपाट हिंसा आगजनी की वारदातों पर अंकुश लगाने की नाकामयाबी किसी कलेक्टर या एसपी के सिर पर लाद देने की राजनीतिक कलाबाजी अब पुरानी पड गई है. यात्रियों भरी बसों को जलाये जाने और यात्रयों को संरक्षण देने मे नाकामयाब शिवराज की ढीली प्रशासनिक पकड. का नमूना मात्र है. प्रदेशभर में इस आंदोलन को पनपाने में शिवराज सरकार नें समझो खुद ही पहल की. राज्य की गुप्तचर विभाग की सूचनाओं पर प्रशासनिक रूप से कामकाज नहीं किया गया. सिर्फ कांग्रेसियों को कोसनाऔर अधिकारियों पर काम पर नहीं लगा पाना शिवराज जी की कमजोरी रही.

18893263_1542136395796426_6627605621736784208_nआईये पहले हम कुछ उन कारणों पर विचार करते हैं जिससे श्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की कीर्ति कलंकित हो रही है. दरअसल यह आंदोलन कांग्रेस समान किसी भी मरे हुए दल द्वारा प्रायोजित बताकर पल्ला झाड. देने की बिषय वस्तु नहीं है. यहां कुछ बुनियादी बातें हैं जिन पर या तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नें श्री शिवराज सिंह को मूक सहमति दे रखी है या भारतीय जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व किसी मजबूरी से बंधा है जो शिवराज सिंह के जादुई नेतृत्व के टूटते तिलिस्म को नजरअंदाज कर रहा है.

प्रदेशभर में अब ऐसी चर्चाओं का दौर आरंभ हो गया है जिनमें कहा जा रहा है कि शिवराज सिंह अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के नक्शेकदम पर चलने लगे हैं. ये रास्ता उसी ओर जाता है जिस पर चलकर कांग्रेस अलोकप्रियता के रसातल में समा गई.

 पुलिसमहानदेशक  निठल्ले साबित हुए ‍ जी हुजूरियों को शिवराज सरकार में तवज्जो

राज्य के कर्मचारियों में इस समय वही रोष अभिव्यक्त हो रहा है जो बर्ष १९९९ में श्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ दिखाई दे रहा था. शिवराज सिंह का सहज रूप से व्यक्त होनें वाला अहं उनके बयानों के सिर चढ.कर बोलने लगा है. माई का लाल जैसे चलन से बाहर जुमले दोहराये जाने लगे हैं. दरअसल शिवराज सिंह बहुत कम समय प्रशासनिक व्यवस्था और दफ्तर को देते हैं . उनका ज्यादातर समय अनावश्यक प्रचार प्रसार और पूजा पाठ जैसे क्रियाकलापों में व्यय कर दिया जाता है. प्रशासनिक अधिकारी उन्हें अपने स्तर से सदैव से कम ही आंकते रहे हैं सो इन्होंने भी कसम  सी खा ली कि सारे प्रमुख प्रशासनिक पदों पर ये ऐसे जी हुजूरों को बिठायेंगे जिनमें दुम हिलाकर सरकार की जी हुजूरी का पूरा अदब हो. बहरहाल नौकरशाही बेलगाम हो चुकी है. दर्जनभर से ज्यादा अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक सरकारी बाबू बने समय व्यतीत कर रहे है. पुलिस महानिदेशक पूरी तरह निठल्ले साबित हुए हैं.

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प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी मंत्रियों की नाफरमानी कर रहे हैं किन्तु मुख्यमंत्री प्रचार प्रसार पूजा पाठ पर्यटन और आनंद मंत्रलय चलाकर प्रदेश का उन समस्याओं का उपहास कर रहे हैं जिनके बूते २०१८ में भाजपा को मध्यप्रदेश में एक महत्वपूर्ण चुनावी अग्निपरीक्षा से गुजरना है नहीं तो मोदी सरकार का वैभव तो कम होगा ही आरएसएस के बढते ऐश्वर्य पर भी पलीता लग जायेगा.

18582482_1085980718213316_3861838596132991079_nएक महत्वपूर्ण मामला राज्य के सपाक्स और अपाक्स कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच का भी है. जिसे तुरंत विचार की जरूरत है. ध्यान न देने की दशा में सवर्णों के बीच मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और संघ के प्रति विश्वास खोटा ही होगा. प्देश में जिस हिन्दू समाज को संयुक्त रखने का विचार आरएसएस के पू. मोहन भागवत जी रखते हैं उस विचार की मध्यप्रदेश में धज्जियां बिखर रही हैं . राज्य के बैतूल में पहले ही आदिवासी समुदाय मुख्यधारा हिन्दू समुदाय से बिखराव के कगार पर है वहीं अब भाजपा और संघ की मुख्यधारा समझे जाने वाले सवर्ण समुदाय का विश्वास शिवराज सरकार से चटख रहा है. गाहे बगाहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान संघ और भाजपा को साध लेते हैं सो विचार की परिधि से परे जाने पर भी शिवराज जी को टोकने वाला कोई भी नहीं है. सवर्णों जिनमें मुख्य रूप से किसान तथा उंची जाति के लोग शिवराज सिंह की बडबोली माई का लाल किस्म की बयानबाजी से गँभीर रॢप से आहत हुए हैं.

जनसंपर्क शास्त्र की एक प्रचलित कहावत है कि प्रचार जब सीमा से अधिक हो तो वह दुष्प्रचार की सीमा में आता है. बहुचर्चित नर्मदा बचाओ यात्रा के मूल में नर्मदा नदी के प्रति स्वच्छता की चेतना प्रधानमंत्री मोदी की सभा में पैसे देकर भीड. खींचने का साधन बनी. प्रमं. नरेन्द्र दामोदरदास मोदी और भाजपा की कीर्ति मलिन करते हुए अमरकंटक और जबलपुर के लिये जुटाई भीड. को भुगतान किये जाने के सरकारी आदेशों के सरेआम जनता के बीच पहुँच जाने और सोशल मीडिया में चर्चा जोरों पर है. नर्मदा यात्रा को पवित्र अभियान कम शिवराज जी की राजनीतिक शक्ति के रूप में परिभाषित किया जाना प्रचार की सीमा का उल्लंघन ही समझा जाना चाहिये. गौरतलब है कि बर्ष २०१५ से बर्ष २०१६ तक के साल सिंहस्थ की भेट चढ. गये और २०16 से २०१७ का आ धा साल नर्मदा यात्रा को समर्पित रहा. bhaiya ji ujjain_kumbh_900-1444119435                शायद ही कभी प्रशासनिक और अनुभवी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री की बैठक की तस्वीरे प्रकाश में आती हैं . सिंहस्थ और नर्मदा यात्रा से हिंदुत्व   को कितना लाभ हानि हुई इसका अंदाजा संघ के शीर्ष नेताओं श्री मोहन भागवत दत्तात्रय होसबोले भैयाजी जोशी जानें लेकिन श्री शिवराज का तीसरा कार्यकाल अब यदि और बढाया जाता है तो भविष्य के नुकसान का अंदाजा लगाना बहुत कठिन कार्य नहीं होगा. संघ के पदाधिकारी संभव है कि शिवराज के मायाजाल में फंसे प्रतीत होते हैं वरना बीते तीन बर्षों में शिवराज सरकार के कामकाज से संघ की खिल्ली ही उडा.ई जाती रही है.RSS Shiksha Barg

शिवराज सरकार ने जनसंपर्क विभाग के माध्यम से आज कल मध्यप्रदेश की जनता के श्रम का करोडों रूपया भ्रमित कर देने वाले प्रचार कार्य में झोंक दिया. देश के हर हिस्से में शिवराज की धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने का प्रयास किया गया .देश के हर हवाई अडडे से उड.ने वाले हवाई जहाज की पिछली सीट पर मोटे मोटे विज्ञापन लगने से लेकर देश की हर भाषा में प्रसारित होने वाले समाचार पत्रों और टी.व्ही चैनलों को दिये विज्ञापनों का हिसाब अब प्रदेश की जनता मांग रही है.

भारतीय जनता पार्टी के संगठन में अपने चहेतों की भर्ती और विभिन्न जिलों का प्रशासन अपने चहेतों के हाथ देने वाले श्री शिवराज सिंह प्रशासनिक तौर पर राज्य प्रशासनिक सेवा और राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों को ही तवज्जो देते हैं .

ias-meet-3 भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी मध्यप्रदेश में निर्णय की प्रक्रिया से दूर हैं .यही कारण है कि प्रशासन में दूरदर्शिता और व्यापक सोच का भाव परिलक्षित होता है. प्रशासनिक अधिकारियों में एक तबके का ऐसा मानना है कि शिवराज सिंह टैलेंट से डरते हैं इसलिये अपने आसपास वे अल्पज्ञानियों को तवज्जो देते है. जिलों में संगठन से जुडे. बहुत सारे वरिष्ठों को हाशिये पर ला दिया गया है. शिवराज सरकार के मंत्री भी अपने मुखिया के समान प्रचार सुख में डूबे हैं. कार्यकर्ता धीरे धीरे अपनी उपेक्षा के कारण संगठन से दूर हो रहे हैं. सवर्णों में पहले फिर भाजपा के खिलाफ स्वर मुखर हो चले हैं. आने वाले चुनाव में अपनी सरकार चौथी बार बनाने के स्वप्नदोष से पीडि.त सिवराज सरकार और उनके मंत्री पूजा पाठ कन्यभोज और भंडारे में व्यस्त हैं.

कांग्रेस को संजीवनी देने वाले शिवराज सिंह …दिग्गी राजा का भाजपा पर किया अहसान लौटायेंगे शिवराज जी

diggi 3 18486375_628977680633758_4179821355755642281_nमृतप्राय कांग्रेस के पास आज भी मध्यप्रदेश में संगठित शक्ति का घोर अभाव है. कभी कमलनाथ को तो कभी सिंधिया को मध्यप्रदेश में मौका देने की बात कहकर कांग्रेस के मौका परस्त अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं . डम्पर व्यापम घोटाला सवर्णों का जोरदार विरोध लचर प्रशासनिक व्यवस्था और प्रचार के दुष्प्रचार की सीमा में आने के बाबजूद यदि भाजपा मध्यप्रदेश के मामले में कोई महत्वपूर्ण निर्णय कर सकी तो दी मोदी का जादू २०१९ में चलने की संभावना है वरना जिस स्थिति में आज संघ और भाजपा खडे. हैं दुबारा वहाँ तक पहुँचने के लिये दो तीन दशक का सफर दुबारा तय करना पड. सकता है.. जारी आंदोलन को केवल किसानों का आंदोलन मान लेना बडी. व्यापक भूल होगी.. बल्कि इस आंदोलन की आग उस भीतरी विस्फोट की ओर इशारा कर रही है जिसके परिणाम २०१८ में भाजपा को भोगने हैं. कांग्रेस में शिवराज की कूटनीतिक भूलों से कार्यकर्ता स्तर तक संगठन की चेतना लौटने लगी है. एक तरफ सरकार कह रही है कि ये कांग्रेस का भड.काया आंदोलन है तो दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि कांग्रेस का कोई वजूद नहीं है.