इंदौर से श्रीमाधवनाथ महाराज की पादुकायें क्यों पहुंची पुणे के दगडू.शेठ गणपति मंदिर ,  क्या है दगडू.हलवाई मंदिर का रहस्य जानिये………!

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श्री माधवनाथ महाराज की पादुकायें पुणे के दगडू. शेठ मंदिर जाने से पूर्व पूजन स्थल श्री भुरचंडी के आवास पर.

श्री माधवनाथ महाराज की पादुकायें इंदौर से बिशेष पाळकी में पुणे पहुंच गईं है. पुणे स्थित सुप्रसिद्ध दगडू.शेठ हलवाई गणपति मंदिर की स्थापना के १२५ बर्षसंपन्न होने के उपलक्ष्य में आयोजिक आध्यात्मिक समारोह में स्व.आध्यात्मिक संत श्री माधवमहाराज की उपस्थिति की प्रतीक पादुकाएं उनके भक्तों और अनुयाईयों के लिये श्रद्धा एवं आस्था का स्रोत समझी जाती हैं. पुणे के दगडू.शेठ गणपति की स्थापना के १२५ बर्ष पूर्ण होने पर आयोजित इस समारोह में पुणे से ट्रस्टी स्व.श्री माधवनाथ महाराज को न्यौता देने प्रत्यक्ष इंदौर म.प्र. पहुंचे थे. इसी निमंत्रण को पाकर प्रत्युत्तर में इंदौर से स्व. श्री माघवनाथ महाराज की चरण पादुकायें बिशेष पालकी में ससम्मान पुणे पहुँचाई गई हैं.

पुणे में महाराज माधवनाथ की चरण पादुकाओं के पहुँचते ही श्रद्धालुओं में स्वागत को लेकर बहुत उत्साह देखने में आया है. विगत दिवस नागपुर के भुरचंडी परिवार नें अपने पुणे स्थित आवास पर श्री माधवनाथ महाराज की पादुकाओं का

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इष्टमित्रों और परिजनों के साथ पादुकाओं का पूजन करते हुए संदीप भुरचंडी और इंदौर से पधारे विश्वासु.

विधिवत पूजन समारोह आयोजित किया.

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संदीप भुरचंडी और उनकी पत्नी जुही भुरचंडी पूजा के आनंद में.

पुणे में अपने आवास पर श्री संदीप भुरचंडी नें अपनी पत्नी श्रीमती जूही भुरचंडी बेटे विराज और बिटिया सारा के साथ अपने आवास पर श्री माधवनाथ महाराज की पादुकाओं की अगवानी कर एक कार्यक्रम आयोजित कर पादुकाओं का पूजन किया. इस अवसर पर इंदौंर से पादुकाओं के साथ पधारे ट्रस्टी और अनुयाईयों नें कुछ समय भुरचंडी परिवार की मेहमानी की. यहां कार्यक्रम में इंदौर से पादुकाओं के साथ पधारे विश्वासुओं सर्वश्री संजय नामजोशी, श्री भिडे., श्री तुषारकर ,श्री महाशब्दे और श्री आप्टे नें भाविकों को पादुकाओं के दर्शन और पूजा करनें में सहयोग दिया. इस दौरान श्रीमती जाई परूळकर , पुणे के नगरसेवकगण श्रीमती स्वप्नाली प्रहलाद सायकर, श्री गणेश कलमकर, अमोल बालबळकर के अलावा वरिष्ठ समाजसेवी श्री रितेश वैद्ध,  श्री तात्या बालबळकर, श्री सुधीर बाडीकर ,एडव्होकेट तोड.कर वं विदेश प्रवास से आये श्री नरेन्द्र ठोमरे नें पादुकाओं का पूजन- अर्चन किया. इसके बाद पादुकायें अपने गंतव्य स्थल दगडू.शेठ गणपति मंदिर की ओर रवाना हो गईं.

Dagdu shet templeमाधवनाथ महाराज की प्रेरणा से ही बनाया दगडू. शेठ नें गणपति मंदिर 

श्री माधवनाथ महाराज और पुणे के दगडू.शेठ हलवाई गणपति मंदिर की स्थापना का परस्पर बहुत गहरा संबंध रहा है. पुणे में दगडू. शेठ के नाम से विख्यात दगडू. हलवाई मूलत कर्नाटक के लिंगायत समुदाय से रहे हैं. सन् १८०० से ही श्री दगडू. अच्छी मिठाईयों के बनानें वाले हलवाई के रूप में प्रसिद्ध होने लगे थे. बाद में वे दगडू. शेठ हलवाई के नाम से सुप्रसिद्ध हुए.उनकी मिठाई की दुकान आज भी पुणे के दत्त मंदिर के निकट काका हलवाई के नाम से सुप्रसिद्ध है.

दगडू.शेठ हलवाई को उस समय गहरा मानसिक आघात पहुंचा जब उनके इकलौते पुत्र की प्लेग की बीमारी से आसामयिक मृत्यु हो गई. दगडू. शेठ और उनकी पत्नी बृद्द आयु में अपने भरे-पूरे परिवार में जवानपुत्र की मृत्यु से अवसाद की स्थिति में चले गये.ऐसे कठिन समय में आध्यात्मिक गुरू श्री माधवनाथ महाराज नें उन्हें संयत रहने का संबल दिया. श्री माधवनाथ महाराज नें उन्हें समझाया कि वे अब भगवानश्री गणपति को ही गोद लिया जानकर उनके प्रति समर्पित होकर शेष जीवन आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक कार्यों में समर्पित करें. श्री माधवनाथ जी महाराज की प्रेरणा से ही पुणे के बुधवारपेठ में श्री गणपति का भव्य मंदिर बनाया गया जिसका निर्माण १८९३ में पूर्ण हुआ. यही मंदिर श्री दगडू.शेठगणपति मंदिर के नाम से विख्यात हुआ. दगडू.शेठ की उन दिनों लोकमान्य श्री बालगंगाधर तिळक से गाढी मित्रता रही है.श्री तिळक को श्री गणपति के प्रति दगडू. शेठ की प्रेरणा से आजादी की लडा.ई में श्री गणेशोत्सव के द्वारा जनचेतना का विचार पल्लवित हुआ. बाद में यह अभियान देश की आजादी के साथ साथ सामाजिक परिवर्तन का कारण बना. इसीलिये इन सब सामाजिक और आध्यात्मिक संदर्भों का गौरवपूर्ण इतिहास प्रेरणादायक है.

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गणेशोत्सब के दौरान तो श्री गणपति की साजसज्जा और रूप की मनमोहक छटा देखते ही बनती है.
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दगडू. शेठ गणपति जो पुणे शहर में धार्मिक और ऐतिहासिक अस्मिता के प्रतीक हैं.

दगडू.शेठ गणपति प्रतिमा जय-विजय नामक कलाकारों के द्वारा निर्मित ७.५ फीट लम्बी औकर चार फीट चौडी. अत्यंत सुंदर प्रतिमा है. श्री माधवनाथ महाराज की प्रेरणा  से बने इस अद्भुत प्रतिमा के सौंदर्य के लिये लगभग आठ किलो शुद्ध स्वर्ण का विविधता पूर्वक उपयोग किया गया है. प्रतिबर्ष श्रद्धालुओं द्वारा चढाये जाने वाले स्वर्ण और रजत के गहनों से लबालब दगडू.शेठ गणपति के खजाने में धन की कोई कमी नहीं है. भारत के सुस्थापित और धनी माने जाने वाले द हलवाई गणपति ट्रस्ट को महाराष्ट्र में सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों के संचालन के लिये एक विश्वसनीय और ईमानदार ट्रस्ट के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है. इस ट्रस्ट की सामान्य गतिविधियों में मंदिर में नियमित भजन पूजन आरती ,प्रसाद और श्री गणेश अथर्वशीर्ष के पठन पाठन के अलावा गणेशोत्सव के दौरान बुधवारपेठ में भव्य साज सज्जा की जाती है. पुणे के कोंडवा में बर्ष २००३ से पिताश्री नामक एक बृद्धाश्रम संचालित है बच्चों की पढाई और एंबुलैंस की सेवाये इस ट्रस्ट की नियमित गतिविधियों का हिस्सा हैं.

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चिंतन की मुद्रा में माधवनाथ महाराज का अविस्मरणीय चित्र.

श्रीमाधवनाथ महाराज का संबंध कार्वी चित्रकूट मध्यप्रदेश से है.वे नाथ संप्रदाय से हैं और नवनाथ के रूप में प्रसिद्ध हैं.योगाब्यानंद श्री माधवनाथ महाराज का जन्म शक १७७९ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा २६ मार्च १८५७ श्रीमती मथुराबाई की कोख से हुआ. इनके पिता मल्हारदादा रत्नपारखी कुलकर्णी पंगारी गांव सिनार तालुका नासिक जिले के रहवासी रहे हैं. भगवान बालाजी को इष्टदेव मानने वाले श्री माधवमहाराज १३ बर्ष की आयु में तीर्थाटन पर निकल पडे.थे. बद्रीनाथ रामेश्वरम तथा १२ ज्योतिर्लिगों पर निरंतर साधना और हिमालय अंचल में ६ बर्ष के कठिन तपस्या के बाद योगसिद्ध माधवनाथ महारा आध्यात्मिक गुरू के रूप में समाज सेवा करते रहे.

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श्रीनाथ जी एवं होल्कर राजपरिवार इंदौर का स्मृति चित्र

वे योग और प्रभु नाम स्मरण के माध्यम से आध्यात्मिक प्रचार में अपने अनुयाईयों को जोडते रहे. उनके अनुयाईयों नें औरंगाबाद के देवगांव एवं रत्नागिरी में भव्य लक्ष्मी वेंकटेश मंदिरों का निर्माण किया है.बुधवार पेठ का प्रमुख दत्तमंदिर भी महाराज की प्रेरणा का ही फल है. इसके अतिरिक्त इंदौर नागपुर  त्रयंबकेश्वर नाशिक अकोला वर्धा हिंगणघाट शिराळे नादगांवपेठ और काशी में भी मंदिरों की स्थापना की गई जो मानव समुदाय को आध्यात्मिक रूप से शिक्षित करनें में महती भूमिका निबाह रहे हैं.

( आलेख और संकलन – सुधाकर बोरकर अभ्यंकर नगर नागपुर )