( नीरज ओमप्रकाश श्रीवास्तव की रपट  )

श्री दिग्विजय सिंह की नर्मदापरिक्रमा यात्रा के ३६ दिन पूरे हो चुके हैं. राजनीति के शिखर से जैसे वैराग्य लेकर राजा निकल पडा.है एक ऐसी धार्मिक यात्रा पर जो राज्य की जीवन रेखा मां नर्मदा के सामान्तर चलने वाली टेढी-मेढी और खतरों से भरी जिंदगी के आनंद में डूबी जीवन शैली के बहुत करीब है.

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दिग्गी राजा और रानी अमृता के हरकदम पर हमकदम बन कर यात्रा में लगातार चल रहे हैंं श्री रामेश्वर नीखरा जी

श्रीमती अमृता राय ने यात्रा के आरंभिक दिनों में भले ही इस यात्रा को अपने पति हठी राजा दिग्विजय सिंह की उन्मादी हठ जान उनके साथ चलना मंजूर किया होगा किन्तु जैसै-जैसै दिन बीत रहे हैं यात्रा के हरेक पल के अनुभव को मोती के समान सहेजना और सैंकडों मंदिरों का प्रत्यक्ष दर्शन कर रास्ते की जटिल रास्तों से निकलते सहज समाधान उनके अनुभव में शुमार हो रहे हैं. श्री दिग्विजय सिंह के साथ चलने का उनका मार्ग उतना आसान नहीं है लेकिन दिग्गी राजा के अनुभव और श्रीमती अमृता की क्षमता नें इस कठिन मार्ग की बिषमता को सरलता में बदल डाला है. सचमुच यह एक धार्मिक भाव से की गई यात्रा ही है जिसके पुष्यप्रभाव यदि इस जनतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक लाभ का मार्ग प्रशस्त कर दें तो उसे अजूबा नही समझा जाना चाहिये.

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कभी कांग्रेस की आपसी राजनीति में ३६ थे आज धार्मिक यात्रा मे ६३ हो रहे हैं.

दिग्गी-अमृता की इस नर्मदापरिक्रमा यात्रा मे पहले दिन से ३६वें दिन तक लगातार साथ बनें हैं श्री रामेश्वर नीखरा जो ९० के दशक तक दो बार सांसद की आसंदी सम्हाल चुके हैं. कभी राजकाज को को लेकर श्री दिग्विजय सिंह से ३६ का आंकडा.भी रहा है तो दिग्विजय के मुख्यमंत्रित्व काल में अपनी उपेक्षा से व्यथित रहे श्री नीखरा कभी-कभी राजा को कोस दिया करते थे. लेकिन काल का पहिया जब घूमे भैया तो ३६ को ६३ होनें में देर नहीं लगती. श्री नीखरा पूरे ३६ दिनों से ६३ होकर राजा-रानी के हमकदम बने हुऐ हैं और यात्रा के पुष्य में बराबर के भागीदार.

श्री रामेश्वर नीखरा मूलत नरसिंहपुर से हैं. सन ८० और ८४ में होशंगाबाद लोकसभा से सांसद भी रहे हैं. २०१४ में वे सातवीं बार मप्र.बार काउंसिल के चेयरमैन रहे.पेशे से वकील होने के बाबजूद मृदुभाषी और स्मृति के मामले में एकदम पक्के श्री रामेश्वर नीखरा नें अपने राजनीतिक सफर में बहुत उतार चढाव देखे हैं लेकिन श्री दिग्विजय सिंह की इस यात्रा में लगभग ७० बर्ष की आयु जनित कठिनताओं के बाबजूद वे ही ऐसे व्यक्ति हैं जो अब तक इस यात्रा में लगातार अनवरत हैं. आयु और अनुभव के मान से श्री नीखरा बिल्कुल कम नहीं हैं और उनके अनुभव से ही उन्होंने ये जान लिया कि उनका इस यात्रा में हमकदम होने से न केवल दिग्विजय सिंह का सानिध्य मिलेगा और जनसंपर्क तो होगा ही.

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पहले यह समझा जा रहा था कि श्री नीखरा ३० सितंबर को आरंभ हुई यात्रा में एक दो-तीन दिन जरूर चलेंगे पर ज्यों-ज्यों सफर बढता गया श्री नीखरा को श्री दिग्विजय के संकल्प की गहराई का अंदाजा होने लगा. वे ये समझ गये कि यह यात्रा राजा-रानी के पैदल चलने की सरल कहानी से हटकर जन-जन की जुबानी में राजा-रानी की कहानी के इतिहास लिखे जाने की रवानी है सो वे इस इतिहास के हर अध्याय और हर पन्ने पर दर्ज होते जा रहे हैं. वे स्वयं भी बहुत धार्मिक और जनोन्मुखी विचार के नेता हे और उनके संपर्क और मिलनसारिता के चलते वे यात्र में चलने वाले हजारों लोगों से प्रतिदिन संवाद रखते हैं. राज्यभर से दिग्गी-अमृता की नर्मदा यात्रा के मेले में आने वाले सहस्त्रों कांग्रेसजनों को वे यात्रा के सूत्र में बांध रहे हैं. राजादिग्विजय और रानी अमृता के साथ इस धार्मिक यात्रा में नर्मदा अंचल के सैंकडों मंदिरों पर मत्था टेकने का उनका सपना भी पूरा ही हो रहा है.

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परिक्रमा के अगले पडाव की ओर चलने की योजना बन रही है. श्री रामेश्वर नीखरा के साथ हैं विधायक सचिन यादव लटेरी-आनंदपुर के रविन्द्र उपाध्याय और पूर्व सांसद नारायण अमले.

नर्मदा अंचल के सपूत के तौर पर उनकी अपनी छवि है लेकिन राजा-रानी के इस सफर में उनका साथ राजा दिग्विजय सिंह को बहुत रास आ रहा है. क्योंकि हमउम्र साथी और विचारवान धर्मपरायण दोस्त के साथ सफर का मजा ही कुछ और है. दिग्विजय-अमृता की यात्रा अभी बहुत लम्बी है वह मात्र इस नर्मदा परिक्रमा से समाप्त होने वाली नहीं हैं बल्कि भविष्य की संभावनाओं को देखने पहचानने वाले सहज जान सकते हैं कि ये नया सफर अभी बहुत लंबा चलेगा. धार्मिक यात्रायें राजनीतिक जीवन के पडा.व का हिस्सा बनती रहेंगी पर राजनीति के अंतिम पडा.व तक ये काफिला फिर से जरूर पहुंचने वाला है.

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लटेरीऒ आनंदपुर-सिरोंज के अलावा दिग्गी राजा के गढ. राघौगढ से भी लोग निरंतर यात्रा में हमसफर बनें हैं. श्री वल्देव प्रसाद शर्मा मोहन सिंह जादौन दादा गुलाब सिंह यादव गंभीर सिंह बघेल डा घाकड अरविंद घाकड गोपाल शर्मा और लक्षमण सिंह यादव आदि उनकी यात्ारमें भागीदार बने.
  

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दिग्विजय सिंह कितना भी व्यस्त रहें पर अपने क्षेत्र से आये लोगों से बहुत प्यार से मिलते हैं. सिरोंज-लटेरी से आये रविन्द्र उपाध्याय को देखा तो गले लगा लिया.