पृथ्वी पर तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन से मनुष्य समेत अन्य जीव-जन्तु और पेड़-पौधों को बचाने के लिए 197 देशों के प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के बॉन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस में शामिल हैं. अगले कुछ घंटों में जर्मनी के इस शहर में विकसित और विकासशील देशों को आपस में मिलकर 2016 पेरिस क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस के दौरान हुए पेरिस एग्रीमेंट को लागू करने की महत्वपूर्ण शर्तों पर सहमति दर्ज करनी है.

क्या है पेरिस एग्रीमेंट?

पेरिस एग्रीमेंट के तहत सभी देशों को पृथ्वी के औसत तापमान को औद्योगिकीकरण से पहले के तापमान स्तर से महज 2 डिग्री अधिक तक में सीमित रखना है. हालांकि पेरिस सहमति के तहत ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या का हल निकालने की आक्रामक नीति के तहत वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री तापमान वृद्धि तक सीमित करने की जरूरत है.

क्यों खास है बॉन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस

बॉन की इस क्लामेट कॉन्फ्रेंस और 2016 पेरिस कॉन्फ्रेंस के बीच एक साल के दौरान कई नए रिसर्च सामने आए हैं. नए तथ्यों से पता चला है कि मौजूदा समय में ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार उस स्तर से बहुत ज्यादा है, जिसका अनुमान पेरिस कॉन्फ्रेंस से पहले लगाया गया था. लिहाजा, बॉन क्लाइमेट समिट में सभी पक्षों को पृथ्वी पर जीवन बचाने की कवायद में ज्यादा आक्रामक लक्ष्य निर्धारित करने की जरूरत है.

197 में 170 देशों की है सहमति

गौरतलब है कि 197 देशों के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के तहत हुए पेरिस एग्रीमेंट को 170 देशों से सहमति मिल चुकी है. गौरतलब है कि भारत और चीन ने भी पेरिस एग्रीमेंट को सहमति दी है. इन दोंनों देशों को भी अपनी द्वारा क्लामेट चेंज में योगदान का लक्ष्य निर्धारित करना है.

पेरिस एग्रीमेंट से बाहर अमेरिका?

अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नवंबर 2016 में चुनाव जीतने के बाद जून 2017 को पेरिस एग्रीमेंट से अमेरिका के बाहर निकलने का ऐलान किया था. पेरिस एग्रीमेंट से बाहर निकलते वक्त ट्रंप ने कहा था कि इस एग्रीमेंट को लागू करने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में वह हमेशा के लिए पिछड़ जाएगा. अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने कहा था कि पेरिस समझौता अमेरिका के बिजनेस हित को नुकसान पहुंचाएगा और इससे बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार भी होंगे.

क्यों डर रहा अमेरिका?

पेरिस एग्रीमेंट के तहत सभी देशों को जलवायु परिवर्तन के लिए की जा अपनी कोशिशों का लेखा-जोखा रखना होगा. सभी देशों को एक पारदर्शी तरीके से अपने-अपने देशों में पर्यावरण को बचाने की कवायदों का परिणाम भी वैश्विक स्तर पर जाहिर करना होगा. लिहाजा अमेरिका और यूरोप समेत ऐसे देश जहां औद्योगीकरण का स्तर अधिक है को भी अपने द्वारा ग्लोबल वॉर्मिंग में हो रहे योगदान का भी खुलासा करना होगा. गौरतलब है कि पेरिस एग्रीमेंट के वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वॉर्मिंग में जिसका जितना योगदान है उसे क्लाइमेंट चेंज की निर्धारित स्तर पर रखने के लिए भी उतने ही कड़े प्रावधान करने की जरूरत पड़ेगी.