Padmavatiविजय मनोहर तिवारी से पद्मावती का पत्र व्यवहार….

 पद्मावती को पत्र
प्रिय पद्मावती, 
सादर प्रणाम। संभवत: सात सौ साल बाद ये पहला ही पत्र है, जो किसी ने आपको लिखा होगा। संजय लीला भंसाली नाम के एक कारीगर हैं। वे फिल्में बनाते हैं। इतिहास के किरदारों पर उम्दा फिल्में बनाई हैं। इस बार आप पर उनकी फिल्म आने वाली है। इसके बहाने आप बहस का विषय बन गई हैं। दो बातें आपसे करने का मन हुआ। कभी सोचता हूं कि जब आप श्रीलंका से चित्तौड़ आईं होंगी तो भारत के बारे में क्या सपने आपकी आंखों में रहे होंगे। भारत का परिचय आपको गौतम बुद्ध से ही रहा होगा। समृद्धि और शांति का मुल्क, जहां से तथागत का विचार आज से 23 सौ साल पहले महेंद्र और संघमित्रा श्रीलंका लेकर गए थे। वे मगध सम्राट अशोक की संतान थे। मगर जब आपने चित्तौड़ का रुख किया तब तक महेंद्र-संघमित्रा की कहानी 16 सौ साल पुरानी हो चुकी थी। यहां छह सौ साल से कुछ और ही पक रहा था, जिसकी लपट आपके ही सामने चित्तौड़ को छूने वाली थी। जीते-जी जलती आग में अपने ऐसे अंत के बारे में आपने शायद ही कभी सोचा होगा!

आपके आने के सौ साल पहले ही चित्तौड़गढ़ से 500 किलोमीटर के फासले पर तब दिल्ली हैवानियत का ज्वालामुखी बन चुकी थी, जिसका लावा पूरे भारत को अपनी चपेट में ले रहा था। भारत वीरों की भूमि ही थी मगर वे ऐसे जाहिल युद्ध के आदी नहीं थे, जिसमें कोई नियम-कायदे नहीं थे। धोखा, छलकपट, बेरहमी ही जिनके उसूल थे। अरब की रेतीली हवाओं में पला एक कबीलाई विचार जहां से गुजरा था, उसने सब कुछ जलाकर राख कर डाला था। आपके समय चित्तौड़ का सामना जिस खिलजी से हुआ, वह उसी खूनी जोश से भरा हुआ था। तब तक दिल्ली पर कब्जा हुए सौ साल हो चुके थे। खिलजी को खेलने के लिए खुदा ने बीस साल दिए। 1296 से 1316 के बीच ये बीस साल भारत की बदकिस्मती के भी बीस साल थे।

हमें सत्तर साल पहले की बातें भी याद नहीं रहतीं। आपके और हमारे बीच तो 714 साल का फासला है। हम भारतीय भूलने में माहिर हैं। यूं दुनिया-जहां की जानकारियां होंगी मगर हमें अपने आसपास के इतिहास का कोई पता ही नहीं है। इतिहास के नाम पर अजीब किस्म की बेखबरी है या दूसरों के सुनाए कुछ किस्से-कहानियां हैं बस। वो भी सबके अपने नजरिए के हिसाब से। यहां इतिहास को तोड़मोड़ कर अपनी मनमर्जी लायक बनाकर परोसने की पूरी आजादी रही है। वैसे आपसे बेहतर कौन बता सकता है कि अतीत में याद रखने लायक बचा ही क्या था हमारे पास? कब्जा, कत्लेआम, लूटमार यही था।

आपने 1299 में राजस्थान के ही रणथंभौर में हुए अलाउद्दीन के हमले और औरतों के जौहर के किस्से सुने होंगे। पता नहीं आपके दिल पर तब क्या बीत रही होगी! चित्तौड़गढ़ में उस दिन आपने अपने जीवन का सबसे कठिन फैसला लिया और अपनी अनेक सखियों के साथ चिता की आग की तरफ कदम बढ़ाए। चंद घंटों में सब तबाह हो गया था। आप एक आंसू बनकर भारत की आंख से लुढ़क गईं। उन हालातों में उस धधकती आग में औरतों की सामूहिक आत्महत्याओं को आज हम जौहर के नाम से जानते हैं। आपका जौहर अंतिम नहीं था। चित्तौड़ में ही अगले ढाई सौ साल में और जौहर हुए। हर बार किसी सुलतान या बादशाह के हमले के बाद हारने के हालात में औरतों को अपनी इज्जत बचाने का यही एक रास्ता बचा था।

मध्यप्रदेश में चंदेरी और रायसेन के जौहर भी इतिहास में हैं। चंदेरी और रायसेन के रिश्ते चित्तौड़ राजघराने से तब बहुत गहरे थे। मेवाड़ ने तो अपनी घायल स्मृतियों में आपकी यादों को एक दीये की तरह जलाकर रखा, लेकिन यहां शायद ही किसी को याद हो कि पद्मावती की तरह चंदेरी में राजा मेदिनी राय की रानी मणिमाला और रायसेन के राजा सलहदी की रानी दुर्गावती ने भी अपने नाते-रिश्तेदारों, मंत्रियों, सेनापतियों की औरतों के साथ जौहर किए थे। आपको जानकर दुख होगा कि रायसेन की रानी दुर्गावती चित्तौड़गढ़ के ही राणा सांगा की बेटी थीं। चित्तौड़ से वे डोली में विदा हुई होंगी। मगर अपने सम्मान की खातिर जीते-जी सामूहिक चिता में उतर जाने की शक्ति उन्हें आपकी ही कहानी से मिली होगी! सांगा और बाबर के बीच की जंग में सलहदी भी सांगा की सेना में शामिल थे।

आपके बाद जैसे भारत राख और धुएं की एक भयावह कहानी है। कभी सोचता हूं कि उस क्षण चित्तौड़, चंदेरी या रायसेन के राजमहलों में क्या-कुछ घट रहा होगा, जब यह सूचना मिली होगी कि हम युद्ध हार गए हैं। कभी भी अलाउद्दीन, बाबर या सूरी की फौजें किले में दाखिल हो सकती हैं। महलों में मातम छा गया होगा। जैसे दिवाली के सारे दीये अचानक बुझ जाएं। जान बचाने के लिए आप इंतजार कर सकती थीं। होता क्या? अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ को बेरहमी से लूटता और महीनों की मशक्कत से हासिल इस फतह की पूरी कीमत वसूलता। बेशक इस लूट में आप और बाकी सारी औरतें-बच्चियां भी शुमार होतीं। आपके साथ जितनी भी औरतें उस दिन चित्तौड़ में रही होंगी, वे सब खिलजी के फौजियों में बांट दी जातीं। चित्तौड़ के महल से निकालकर आप सबको सामान की तरह ढोकर दिल्ली ले जाया जाता। दिल्ली के अपने महलों में आप माले-गनीमत की नुमाइश में पेश की जातीं।

आखिरकार खिलजी के हरम में आप बाकी जिंदगी, अपने जैसी ही दूसरी सैकड़ों औरतों के साथ गुजारतीं, जो ऐसी ही लूट में भारत के कोने-कोने से लाई गईं थीं। आपकी मुलाकात गुजरात के राजा करण की रानी कमलादी से भी होती और आप कमलादी की बेटी देवलरानी को भी देखतीं। पता नहीं आपको कैसा लगता यह देखकर कि अलाउद्दीन ने कमलादी को खुद रखा और उसकी बेटी देवलरानी का निकाह अपने बेटे खिज्र खां से करा दिया। बची हुई जिंदगी में अपनी आन-बान और शान के मिट्‌टी में मिलने तक की कहानियां आप एक दूसरे को सुनातीं, कुछ बच्चे पैदा होते और एक दिन किसी अंधेरी कब्र में जाकर दफन हो जातीं। कमलादी और देवलदेवी के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम। तो किसे पता चलता कि पद्मावती कहां गईं, उसका क्या हुआ? पद्मावती इतिहास के अंधेरे में खो गई होती। मगर ऐसा नहीं हुआ। खिलजी की फतहें इतिहास में दर्ज हैं मगर सात सदियों के पार पद्मावती भी आंखों में झिलमिलाती है।vijay 6

चित्तौड़ की आग में भस्म होने के साथ ही आसमान पर गाढ़े धुएं की काली परत छा गई थी। आप चित्तौड़ के आसमान से भारत के दामन में गिरा एक आंसू हैं। सात सौ साल बाद वो आंसू कई सवालों के साथ सामने है। मगर हम सवालों से बचने वाले लोग हैं। फिर एक अकेला पद्मावती का ही प्रश्न होता तो निपट भी लेते। देश का दामन ऐसे अनगिनत आंसुओं से भरा है। आपके साथ जलकर मरीं कितनी औरतों के नाम हमें याद हैं? मणिमाला और दुर्गावती के साथ सामूहिक आत्महत्याएं करने वालीं कितनी औरतों के नाम किसे पता हैं? और उन औरतें के बारे में क्या, जो आपकी तरह जौहर के फैसले नहीं कर सकीं और अपना सब कुछ बरबाद होने के बाद लूट के माल में शामिल होकर सुलतानों-बादशाहों के हरम में समाती रहीं? यह इतिहास से गिरते आंसुओं की अंतहीन झड़ी है, जिस पर किसी भी इज्जतदार कौम को पश्चाताप और शर्म से भरा होना चाहिए। आपको याद करते हुए मेरा सिर शर्म से झुका है। दिल दर्द से भरा है। दिमाग बेचैन है। आप इतिहास का मरा हुआ हिस्सा नहीं हैं। अाप जीवित स्मृति हैं। आप हमारी आंखों की नमी में हैं।

अलाउद्दीन खिलजी हो, तुगलक हो, तैमूर हो, बाबर हो, औरंगजेब हो या नादिर शाह। तवारीख में इन सबने खुद को इस्लाम का अनुयायी होने का दावा बड़े जोर से कराया है। मैं नहीं मानता कि ये मामूली मुसलमान भी थे, क्योंकि मुझे तो यह बताया जाता है कि इस्लाम का मतलब ही है-शांति! अमन का संदेश देने वाले मजहब में ऐसे क्रूर किरदार, जो जिंदगी भर कत्लेआम, लूटमार करते रहे और काफिरों के कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाकर गाजी का तमगा टांगते रहे। ये कम्बख्त कैसे मुसलमान हो सकते हैं? ये भारत के इतिहास के सबसे बड़े गुनहगार हैं।

मुझे नहीं पता संजय लीला भंसाली के सिनेमा में क्या है? मगर मैं जानता हूं कि आज किसी की हिम्मत नहीं कि सच को सच की तरह दिखा दे। कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी भंसाली की फिल्म का विरोध किया है। उनकी दलील दिलचस्प है। वे फरमा रहे हैं कि पद्मावती में मुसलमानों की छवि खराब की गई है। देखिए तो उन्हें अलाउद्दीन में एक मुसलमान दिखाई दे रहा है?

कभी सोचता हूं कि युद्ध हारने के बाद राजे-रजबाड़ों की जो काफिर औरतें इन सुलतानों-बादशाहों और उनके बाकी फौजियों के हिस्से में गई होंगी, उनकी औलादें और उन औलादों की औलादें आज कहां किस रूप में होंगी? वे जो जोर-जबर्दस्ती या लालच से धर्मांतरित हुए होंगे, उनके बच्चे और उनके बच्चों के बच्चे आज कहां और कैसे होंगे, क्या कर रहे होंगे? उनकी याददाश्त में क्या होगा? और आज जो हैं, वे कैसे महमूद, अलाउद्दीन, तुगलक, तैमूर, बाबर और औरंगेजब से अपना रिश्ता जोड़ सकते हैं। वे भी तो इनके पुरखों को दिए जख्मों के जीते-जागते, चलते-फिरते सबूत हैं। इस्लाम के नाम पर सदियों तक लूटमार और कत्लेआम करते रहे इन सुलतानों-बादशाहों से परेशान पुरखे हम सबके एक ही थे। जरूरत है कि ये अपनी याददाश्त पर जोर डालें। तारीख के पन्ने पलटें। अपने दानिशमंदों से मशविरा करें, सवाल पूछें-हम कौन हैं, हमारे पुरखे कौन थे? वे जो यहां हमले करने आए या वे जिन पर हमले हुए और मरते-कटते रहे, जलील होते रहे। अपनी जातीय स्मृति को जगाएं। सच का सामना करें!

अब कुछ नहीं हो सकता। आपके जौहर के बाद इस जमीन पर बहुत कुछ घटा है। यह देश तीन टुकड़ों में बटा है। आप आकर देखें तो हैरान होंगी। अब हम यहां बहुसंख्यक हैं। हम ही अल्पसंख्यक हैं। जबकि आपके समय तक हम काफी कुछ एक ही थे। मगर हमारी याददाश्त कमजोर हैं। हमें पता ही नहीं कि हमारी बेकसूर मां-बहनों के साथ क्या हुआ? कौन कहां से आया और हमारे साथ क्या खेल कर गया? हम जो बहुसंख्यक हैं, वे आपकी कहानी से आहत महसूस करते हैं। हम जो अल्पसंख्यक हैं, वे अलाउद्दीन को अपना समझते हैं। आशा है आप हमारी भूल को माफ करेंगी।

प्रिय पद्मावती हमें विश्वास है आप स्वर्ग में ही होंगी। आप धरती पर मत आइएगा। यहां कुछ भी नहीं बदला है। भारत में लौटकर आपको दुख ही होगा।

उत्तर की प्रतीक्षा है।

आपका ही-
Vijay Manohar Tiwari

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मेरे पत्र पर रानी पद्मिनी का जवाब आया है-
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प्रिय विजय
तुम्हारे पत्र ने चित्तौड़गढ़ की स्वर्णिम स्मृतियों को ताजा कर दिया। वे स्मृतियां जो उस मनहूस दिन राख में बदल गईं थीं। चित्तौड़ के अासमान पर उस दिन सूरज रोज की तरह चमक रहा था। मगर हमारे जीवन में एक गहरी अमावस सामने तय थी। राजपूतों की पीढ़ियों की प्रतिष्ठा दाव पर थी। रनिवास में हम सबके चेहरों का रंग उड़ा हुआ था। ऐसा खौफ इसके पहले कभी महसूस नहीं हुआ था। हमारे पुरुष वीर थे। वे वीरों की तरह ही अपने भाल पर तिलक लगाकर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। हमने अपने दुश्मन पर भी विश्वास किया। कोई छलकपट, धोखा नहीं किया। यही हमारा संस्कार था। शायद यही हमारी कमजोरी थी। आखिरकार हम अपने ईश्वर का स्मरण करते हुए कतार से अग्निकुंड में जाकर अपनों से और अपनी जिंदगी से विदा हुए थे। वह शारीरिक पीड़ा तो पल पर की थी। लपटों में जाकर प्राण पखेरू कुछ ही क्षणों में उड़ गए थे। देह कुछ देर में भस्म हो गई थी। मगर जिंदा रहते बेबसी के वे आखिरी पल पराजय और अपमान की भयावह मानसिक पीड़ा के थे। वह टीस देहमुक्त होने के सात सौ साल बाद भी कम नहीं हुई।

चित्तौड़ को राख में से फिर उठ खड़ा होने में ज्यादा समय नहीं लगा होगा। मगर तब हम नहीं थे। हम चित्तौड़ की यादों का हिस्सा हो गए। चंदेरी की रानी मणिमाला और रायसेन की रानी दुर्गावती के सामूहिक आत्मदाह के बारे में आपने लिखा है। आप इतिहास की किताबें खंगालेंगे तो पता चलेगा कि चित्तौड़ की हैसियत तब आज की दिल्ली जैसी थी। कई राजपूत राजघरानों का शक्तिकेंद्र चित्तौड़ ही था। राणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को शक्तिशाली बनाया था। तब हमारे बहुत गहरे रिश्ते रायसेन, चंदेरी और मांडू के राजाओं से थे। हम जानते हैं कि बाद की सदियों में मणिमाला और दुर्गावती के साथ भी सैकड़ों राजपूत औरतें जौहर के अग्निकुंडों में उतरकर हमारे पास आती रहीं। सुनाने के बाद सबके पास एक जैसी कहानियां थीं। राजपूत राजघरानों की वे रानियां भी अंतत: यहीं आईं, जो तुगलकों और मुगलों के हरम में गई थीं और उनके बच्चे हुए थे, जिनमें से कई सुलतान और बादशाह भी बने। मेरे समय खिलजी था। बाद में नाम बदलते गए। जौहर की आग बुझी नहीं। वह किलों में भी धधकती रही और दिलों में भी! यह सदियों से आ रहे रुलाने वाले समाचारों की ऐसी श्रृंखला है, जिसने हमारी आत्मा को भी इस लायक नहीं छोड़ा कि हम दूसरी देह धारण करके फिर लौटने का साहस करते।

आपने देश के तीन टुकड़ों में बंटने के बारे में भी लिखा। इसका पता हमें तभी हो गया था। पाकिस्तान नाम के टुकड़े में, जो लोग हमारे जैसी ही मौत मरने के लिए मजबूर हुए, उन औरतों-बच्चों के भी कई काफिले यहां आए। कोई कुएं में कूद कर मरा था। कोई तलवारों से काटा गया। कोई जीते-जी शोलों में बदल दिया गया। लाशों से भरी ट्रेनें। कई औरतें, जो लूट के माल की तरह उठा ली गईं थीं, वे एक लंबी यातना भरी जिंदगी जीने के बाद कहीं गुमनाम अंधेरी कब्रों में जा सोईं। वे न इज्जत से जी सकीं, न मर सकीं। उनकी रूह कंपाने वाली कहानियां हमने यहां सुनीं।

तुमने एकदम सच कहा। भारत से हमारा परिचय तथागत गौतम बुद्ध से ही था। श्रीलंका में बुद्ध का विचार भारत से ही आया था। हमारी कल्पना थी कि जहां कभी बुद्ध हुए, वहां हर तरफ शांति होगी, विपस्सना के अनुभव होंगे। जीवन अपने सुंदरतम रूपाें और कलाओं में विकसित हो रहा होगा। निस्संदेह यह धरती का ऐसा टुकड़ा होगा, जिसके पास दुनिया को बताने के लिए काफी कुछ शुभ समाचार होंगे। अजंता-एलोरा, सांची-सारनाथ, नालंदा-विक्रमशिला में बुद्ध का विचार कितने रूपों में खिला, इसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। मगर क्या भारत ने कभी कल्पना की थी कि उसकी समृद्धि किन बेरहम बहेलियों को सदियों तक हमलों और कब्जों के लिए एक खुला निमत्रंण हो सकती है? क्या भारत ने कभी सोचा था कि उसे किन ताकतों से टकराना होगा? किस-किस तरह के बर्बर काफिले भारत का शिकार करने आने वाले हैं? वे किस तरह की कभी न खत्म होने वाली लड़ाइयों में भारत को कोने-कोने में धकेल देंगे और कब्जे कर-करके एक नई पहचान कायम करने की निर्लज्ज कोशिशें करते रहेंगे? किस तरह हमारे ही लोग उस नई पहचान में अपनी जड़ों को भुलाकर गाफिल हो जाएंगे?

दुनिया के इतिहास में यह बहुत ही दर्दनाक अनुभव हैं, जो भारत के हिस्से में आए। भारत धरती का एक और बेजान टुकड़ा भर नहीं था। सदियों की विकास यात्रा में इस देश ने संसार को कई कमाल की चीजें दी थीं। यहां का धर्म इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अंतत: समस्त प्रकार की हिंसाओं से मुक्त होकर सच्ची मानवता के लिए खुले दिल और दिमाग से ही कुछ श्रेष्ठ हो सकता है। इसलिए हमने महाविनाश के महाभारत भी भुगते, किंतु एक समय बुद्ध की शांति को ही शिरोधार्य किया।

मैं पूछना चाहती हूं कि क्या भारत ने आज भी कभी इनके बारे में ठीक से सोचा है? मैं चाहती हूं कि हम एक बार तो सच का सामना करें। यह हमारा साझा सच है। इसमें कोई बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं है। तुमसे सहमत हूं कि हम ही बहुसंख्यक हैं। हम ही अल्पसंख्यक हैं। मैं सात सदियों के इस पार से बहुत साफ देख सकती हूं कि हम सब एक ही हैं। सरहदों के इस तरफ भी हम हैं, उस पार भी हम हैं। मंदिरों में स्तुति भी हम कर रहे हैं, मंदिर के विरोध में भी हम ही हैं और हमें अहसास भी नहीं। रावलपिंडी के पास तक्षशिला किसने बनाया था? अफगानिस्तान में बामियान के बुद्ध किसने गढ़े थे? शैव और बौद्ध परंपराओं का केंद्र रहे कश्मीर में हम ही हम पर पत्थर फैंक रहे हैं। हम ही हमारे पीछे बम-बारूद लिए पड़े हैं। जो जबरन थोपी गई नई पहचानों में गाफिल हैं, वे भी उन आंधियों में उड़े हुए तिनके ही हैं, जो सदियों तक देश के हर हिस्से में हमें भुलाती-भटकाती रहीं। मैं तो उस अपवित्र आंधी से सीधी टकराने वाली बेबस सदियों की एक अभागी किरदार भर हूं।Vijay 5

खिलजी से चित्तौड़ का सामना कोई नई घटना नहीं थी। उसके पहले जलालुद्दीन खिलजी ने भी रणथंभौर को जमकर लूटा और बरबाद किया था। और पहले बिहार-बंगाल में भी नालंदा और विक्रमशिला आग के हवाले किए गए थे। ये कारनामे भी किसी बख्तियार खिलजी ने ही किए थे। गजनी से आए किसी बेरहम मेहमूद ने तो 17 बार भारत को रौंदा था। हम सोमनाथ के किस्से सुनते थे तो डर से ज्यादा आश्चर्य होता था। लूटकर हमारे देवालयों को तोड़ गिराने का मतलब हम कभी नहीं समझे और कई जगह उन्हीं मंदिरों के मलबे से नई इमारतें बनाना तो बिल्कुल ही समझ के परे था। अजयमेरू यानी आज का अजमेर तो हमसे ज्यादा दूर नहीं था। वहां जिसे आप अढाई दिन का झोपड़ा कहते हैं, जरा उन पत्थरों को आंख खोलकर और दिल थामकर देखिए। वे जख्मों की कौन सी कहानी सुना रहे हैं?

सच बात तो ये है कि तब पूरा देश ही मलबे में बदल रहा था। देश हर जगह एक नई और डरावनी शक्ल ले रहा था। चारों तरफ से व्यापारी समूह और राजदूत उस समय के भारत में चल रही लूट और हमलों की कहानियां चित्तौड़ में भी आकर सुनाया करते थे। चित्तौड़ के किले पर खड़े होकर तब हम चर्चाएं किया करते थे कि कोई शासक ऐसा कैसे कर सकता है कि देवताओं की मूर्तियों को तोड़कर मांस तौलने के लिए कसाइयों को दे दे या किसी मस्जिद की सीढ़ियों पर चुनवा दे ताकि वह लोगों के पैरों तले रौंदी जाए? कौन सा धर्म इसकी इजाजत देता है? सत्तर साल पहले एक नया शब्द भारत से सुनने में आया-सेकुलर। मगर हम इसका मतलब नहीं समझे और जो खबरें अब आती हैं तो लगता है कि मेरे भारत को ये क्या हो गया? भारत अपनी चमकदार लेकिन गुमशुदा याददाश्त के साथ किस दिशा में कूच कर गया?

अरे हां, किन्हीं संजयलीला भंसाली का जिक्र तुमने किया है। मुझे अच्छा लग रहा है कि वे कोई फिल्म मुझ पर बना रहे हैं। तुम देखो तो बताना कि पद्मिनी की कहानी को कैसे दिखाया? मुझे विश्वास ही नहीं है कि हमारे दौर की त्रासदियों को कोई जस का तस दिखा सकता है। उसे सब्र से देखने और देखकर शांत रहने के लिए भी बड़ा कलेजा चाहिए। कभी सोचना, आपके घर के चारों तरफ भूखे भेड़ियों जैसे नाममात्र के इंसानों की शोरगुल मचाती पागल भीड़ हाथों में तलवारें चमकाती हुई घेरकर खड़ी हो। वे कभी भी दरवाजा तोड़कर आपके घर में दाखिल हो सकते हों। कोई बचाने वाला न हो। आपकी ताकत लगातार घट रही हो। दाना-पानी बाहर से सब रोक दिया गया हो। आप कब तक टिकेंगे और जब वे भीतर दाखिल होंगे तो क्या होगा? जो होता था, हमने उसके भी खूब किस्से सुने हुए थे। इसलिए हम यह कठोर फैसला कर पाए कि इज्जत की मौत ही ठीक है। भंसाली साहब के लिए यही कहूंगी कि सिर्फ मुनाफे के लिए इतिहास से न खेलें। हम पर जो गुजरी, उसका सौदा न करें। अपनी दादी, नानी, मां, बहन, पत्नी और प्रेयसी में पद्मिनी को देखें। फिर तय करें कि क्या दिखाना है, क्यों दिखाना है?

विजय, तुमने पत्र लिखा। मुझे मेरे आहत अतीत की स्मृतियों में ले जाने के लिए धन्यवाद। अब संपर्क में बने रहना। जो जुल्मों की दास्तान सुनाने के लिए भारत में नहीं बच नहीं सके, वे सब यहां आए। मेरे पास बहुत कुछ है बताने को। भूलना मत। फिर कुछ लिख भेजना। पद्मिनी को भूलने का मतलब इतिहास को भूलना होगा!

-तुम्हारी पद्मिनी

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श्री विजय मनोहर तिवारी ख्यातिनम् पत्रकार और लेखक हैं.

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