स्कूलों में क्रिसमस – एक विश्लेषण

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धरमनिरपेक्षता की स्थिति भारत में जोकर की तरह है पर जोकर सर्कस का नहीं बल्कि जोकर ताश के खेल का जब जैसे काम बन सके बस पत्ता फ़िट कर दिया परंतु इस छद्मधर्मनिरप्रेक्षत के आवरण में लिपटी तुष्टिकरण की तलवार ने देश के सामाजिक ढाँचे को तार तार करने के साथ भारत के संविधान के मूल स्वरूप पर भी घातक प्रहार किए हैं ।
जब बच्चों के शिक्षण संस्थान ही धर्म प्रचारकों के मुख्यालय में तब्दील हो गए हैं तब इस विषय पर चिंता किया जाना लाज़िमी है ।
भारत में आज कुल स्कूलों में २३ प्रतिशत प्राइवैट स्कूलों की भागीदारी है इसमें एक हिस्सा मिशनरीज़ के स्कूलों का भी है जो अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान होने के चलते विशेष दर्जा प्राप्त हैं देश में मुख्य रूप से स्कूली शिक्षा के एतबार से मुस्लिम मदरसे और ईसाई स्कूल ही अल्पसंख्यक संस्थान है इसमें भी बुनियादी तालीम दे रहे मदरसों का डाटा उपलब्ध है जो की राज्यों से मान्यता प्राप्त हैं केवल ०.४ प्रतिशत मुस्लिम बच्चों के दाख़िले के साथ कुल मदरसों का लगभग २० प्रतिशत (ग़ैरमान्यता वाले मदरसों का आँकड़ा सरकारों के पास उपलब्ध नहि है) के आस पास है , जिसकी चर्चा मैं इस आलेख की विषय वस्तु नहि है ।
क़ानूनी रूप से देखा जाए मान्यता प्राप्त मदरसे और मिशनरीज़ के स्कूल बराबरी के पलड़े पर ही हैं लेकिन मिशनरी स्कूलो की संख्या का कोई भी आँकड़ा उपलब्ध नहीं है क्यूँकि बड़ी चतुराई के साथ ये स्कूल इस औपचारिकता से बचते रहे हैं जबकि वे मदरसे जो कि मान्यता प्राप्त है और बुनियादी तालीम दे रहे हैं उनका ब्योरा प्रथक से सरकारी तंत्र द्वारा लिया जाता रहा है ।
भेदभाव की ये विषबेल भी बड़ी विस्तृत है ये केवल बानगी भर है ,इस विषय पर तो पूरी किताब लिखी सकती है कि मिशनरीज़ के स्कूलों के फलने फूलने देने के लिए मदरसों से कितनी क़ुर्बानियाँ ली गयीं हैं ।
विषयान्तर न होते हुए आज क्रिसमस पर ये आलेख लिखने की वजह पर आते हैं जो कि वाक़ई में उतनी ही गम्भीर है जितनी मैंने शुरुआत में लिखी है संविधान के अनुच्छेद २९ एवं ३० में धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी मर्ज़ी के शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार मिला हुआ है । जिसके प्रति ईसाई समुदाय न केवल सचेत है बल्कि उसका पूरा लाभ भी समुदाय ने उठाया है और बेहतरीन शिक्षण संस्थान देश के अपनी मर्ज़ी के कोने कोने में ( अपनी मर्ज़ी कोने के भी गहन शोध के बाद पता चले हैं इसकी चर्चा भी पृथक की जाएगी ) स्थापित किए हैं ।
परंतु उसी संविधान में अनुच्छेद २८(३) भी है जिसके बारे में शायद ही कभी हिंदू या मुसलमानो में जनसामान्य के बीच चर्चा होती हो ।
उक्त संवैधानिक प्रावधान के अनुरूप १८ वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को उसके माता पिता की अनुमति के बग़ैर उसके स्वयं के धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की शिक्षा नहीं दी हंस सकती फिर चाहे वो कैरोल या प्रेयर ही क्यूँ ना हो । स्कूली बच्चों को क्रिसमस के बारे में जानकारी देना धर्मनिरपेक्षता है ।
परंतु स्कूल में आडंबरयुक्त धार्मिक अनुष्ठान आयोजित कर स्कूली बच्चों से उनके स्वयं धर्म के अतिरिक्त कोई और धार्मिक गतिविधि में उपयोग अपराध है, जिसके प्रति भारत उदासीन है ।

प्रियंक कानूनगो

(लेखक राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य है )