Raghogarh Fort-नीरज ओमप्रकाश श्रीवास्तव की कलम से

ऐतिहासिक तथ्य संकलन- द ब्यूरोक्रेट वर्ल्ड / बहुमत समाचार समूह

छायांकन- प्रताप सिंह राघौगढ.

 देश के हिन्दुवादी समुदाय की भावनाओं के विरूद्ध अपने कतिपय बयानों के लिये मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह बीते दशक भर से कट्टरपंथी हिन्दुसमुदाय के निशाने पर ही रहे है. अपने संकल्पों के प्रति दृढ. बने रहने वाले राजहठधारी श्री दिग्विजय सिंह नें अपनी धर्मनिरपेक्षता के चलते बीते दो दशकों के दौरान देश की राजनीति के सबसे दोयम दौर में कथित कट्टरपंथी हिन्दु समुदाय की ओर से जितनी गंदी गालियां झेली हैं वह बेहद दर्दनाक रहीं हैं. लेकिन इन गालियों की परवाह के बगैर जिस आत्मविश्वास और अपने विचारों के प्रति निश्चयी और दृढ. रवैया हठयोगी राजा श्री दिग्विजय सिंह ने अनवरत बनाये रखा वह अचंभित करने वाला है.3

 श्री दिग्विजय सिंह नें अपनी सहधर्मिणी अमृता सिंह के साथ २४९१ किलोमीटर लम्बी पदयात्रा परिक्रमा करने का जो संकल्प उठाया वह उनके हिंदुत्व के मौलिक विचार और धार्मिक आस्था के प्रति प्रतिबद्धता का एक ऐसा नवीनतम उद्धरण है  जो राजनीति में धर्म की श्रेष्ठता के आदर्श को स्थापित करने वाला तो है ही बल्कि देशभर में बिखरे राजवंशो की गाथाओं के इतिहास में भविष्य की किंवदंतियों के रूप में जनमानस के स्मृतिपटल पर अंकित हो जायेगा. देशभर में विभिन्न राजरियासतों के इतिहास में किसी प्रतापी से प्रतापी राजा ने भी पुण्यसलिला श्री नर्मदा की दुर्गम समझी जाने वाली पदयात्रा करने का दुस्साहस नहीं किया.

इसे दिग्विजयी राजहठ का ही परिणाम समझा जा सकता है कि अब तळक दीनहीनों , साधुसंतो  घर परिवार से विरक्त दम्पत्तियों और मलंग बाबाओं की एकछत्र अधिकार मानी जाने वाली श्री नर्मदा पदयात्रा जैसे महान धार्मिक  दिग्विजयी आचरण को बहुमूल्य सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल हुई है . देशभर के हिन्दू बौद्धिक समुदाय के संपन्न लोगों का ध्यान  इस विराट परिक्रमा की अद्भुत सांस्कृतिकता और धार्मिक महत्व ने अपनी ओर खीचा तो वहीं मध्यप्रदेश के इतिहास से संबद्ध राधौगढ. स्टेट की धार्मिक एतिहासिक परंपराओं की पुनरावृति देशभर के प्रबुद्ध धार्मिक समाज में चर्चा का बिषय बन गई है.

Raja Dhiraj Singh of Raghogarh watching an elephant attacked by a leopard श्री दिग्विजय सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती अमृता सिंह की श्री नर्मदा परिक्रमा यात्रा पर चर्चा से पहले राघौगढ स्टेट और उससे जुडी.धार्मिक किंवदंतियों पर एक सिंहावलोकन……….

सन् १६७३ से १९४७ तक राघौगढ स्टेट विधिवत अस्तित्व में रही. दिल्ली के पृथ्वीराज राजवंश की शाखा के राजपूत खींची वंशज राजा लाल सिंह नें १६७७ में राघौगढ के किले की स्थापना की . राघौगढ़ राजवंश में प्रतापी राजा हुए प्रताप राव खींची। उच्च राजसी शिक्षादीक्षा के साथ इनकी रुचि आध्यात्म की ओर भी थी, जिसका प्रभाव उनके साहित्य में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। किवदंतियों के अनुसार राजा प्रताप सिंह जिन्हें बाद में स्नेहवश पीपाजी संबोधन मिला अपनी कुलदेवी से प्रत्यक्ष साक्षात्कार करते थे वं उनसे बात भी किया करते थे।  जब इनको पीपाराव नाम से संबोधन प्राप्त हुआ उस समय वे जन-जन में लोकप्रिय हो चुके थे. अपने अल्प राज्यकाल में पीपाराव जी द्वारा फिरोजशाह तुगलक, मलिक जर्दफिरोज लल्लन पठान जैसे योद्धाओं को पराजित कर अपनी वीरता का लोहा मनवाया। उनकी प्रजाप्रियता नीतिकुशलता के कारण आज भी उन्हें गागरोन मालवा के सबसे प्रिय राजा के रूप में मान सम्मान दिया जाता है।

 कालांतर में वैराग्य भाव उत्पन्न होने कुलदेवी से प्राप्त निर्देशानुसार रामानन्दजी ने एक वर्ष पश्चात् गागरोण आकर दीक्षा प्रदान करने का आश्वासन देकर इनको वापस गागरोण भेज दिया। इनके द्वारा ईश्वर भक्ति व् सन्त सेवा में एक वर्ष व्यतीत करने के पश्चात् रामानन्दजी गागरोण पधारे। इन्होने अपने भतीजे कल्याणराव का गागरोण नरेश के रूप में राज्याभिषेक किया व् छोटी रानी सीता के साथ दीक्षा ग्रहण कर नरेश पीपाराव से संत शिरोमणि भक्त पीपाजी महाराज हुएजिनका उल्लेख भक्तमाल में आता है। संत पीपा का अध्यात्मिक दर्शन सगुण व् निर्गुण भक्ति की निर्मल धारा का प्रवाह है। इन्होने ब्राम्हण सोई पिंडेयानि आत्मा में ही परमात्मा की उपस्थिति को माना।

राघौगढ स्टेट बहुत छोटी सी रियासत रही लेकिन इतिहास में भी समूचे भारतबर्ष में हिन्दू धर्म-ध्वजा लहराने में अव्वल मानी जाने वाली इस रियासत के लगभग सभी पूर्व राजाओं ने हिन्दुत्व के मौलिक रूप को न केवल आत्मसात किया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में सदैव अगुवाई की है. Raghogarh_Shravana_Kumar_800wराघौगढ. स्टेट के द्भितीय राजा थे श्री धीरज सिंह जिन्होंने आमेर के महाराजा जय सिंह और सिसोदिया घराने के महाराजा संग्राम सिंह द्भितीय के साथ गहरा आत्मीय रिश्ता जोडा. १६९७-१७२६  के दौर के इन धर्म-धुरंधर महाराज नें अनेक मंदिर बनबाये कुओं तालाबों और बाबडि.यों का निर्माण कराया. आरोन, जारखोन और चांचौडा. के किलों की मरम्मत के अलावा राघौगढ किले को वृहत स्तर पर निर्मित कराया. महाराज धीरज सिंह के कार्यकाल में हिन्दुत्व की सर्वेभवन्तु सुखिन: की भावना राज्य भर में प्रचलित रही. वे सीखने- सिखाने के माध्यम से राज्य में सुख-चैन की परम स्थापना के पक्षधर थे. उनके कार्यकाल में संगीत और पेंटिंग कला को बहुत संरक्षण मिला. उनकी विभिन्न मुद्राओं के पोर्टरेट्स आज भी राघौगढ. में संरक्षित हैं. इसके अलावा ललित कलाओं राग-रंगिनी बारामास , रामायण और महाभारत के प्रसंगों का चित्रण किये जाने के अनेक प्रमाण आज भी जीवित हैं. धीरपुर गांव के चारभुजी मंदिर की दीवारों पर चित्रित पेंटिग्स और राघौगढ. स्कूल आफ मालवा पेंटिग्स कलाप्रेमियों के आकर्षण की केन्द्र हैं. महाराजा धीरज सिह अपने कार्यकाल में ब्राहम्णों के प्रति बहुत उदारमना और दानी पृवृति के रहे. उनके काल में भाट, चारण, बैरागी सब कृपापात्र रहे. बजरंगगढ के किले में सिद्ध रूप में राजा धीरज सिंह आज भी पूज्नीय रूप में प्रतिष्ठित हैं. राघौगढ़ में महाराज धीरज सिंह जी के नाम से आज भी ऊतरी बांधी जाती है।Todi_Ragini,_Second_Wife_of_Hindol_Raga,_Folio_from_a_Ragamala_(Garland_of_Melodies)_LACMA_M.77.130.1 राघौगढ़ किले के पीछे एक धीरपुर नाम का स्थान है, जहां राजपरिवार के पूर्व राजाओं की छतरियां बनी हैं। ऐसी मान्यता है कि अगर किसी को भी सांप काट ले, तो आज भी महाराज धीरज सिंह जी के नाम का धागा बाँधा जाता है। उस व्यक्ति को एक निश्चित समय वहां ले जाकर पूजा की जाती है और राघव जी की कृपा से वो व्यक्ति बिल्कुल ठीक हो जाता है। ऐसे हज़ारों उदाहरण, राघौगढ़ की जनता ने देखें हैं। आप यकीन कीजिये, इस घोर कलियुग में कहीं सत्य, धर्म और पूर्वजों के आशीर्वाद का साक्षात्कार के लिये राघौगढ़ का महत्ता आज भी है.

Raja_Dhiraj_Singh_of_Raghogarh_(6125101254)राघौगढ. के तीसरे राजा गज सिंह महाराज धीरज सिंह के बडे. पुत्र थे जो १७२६ से १७२९ तक गद्दी पर रहे. १७३० से १७४४ तक चौथे राजा विक्रमजीत सिंह प्रथम का कार्यकाल रहा. विक्रमजीत शासनकाल की सबसे बडी उपलब्धि रही कि वे राजपूत राजाओं के परस्पर एकीकरण के केन्द्र में रहे. उदयपुर के राजा श्री जगत सिंह कोटा के श्री दुर्जनसाल बूंदी के महाराज उम्मेद सिंह और राजगढ. के राजा श्री जगत सिंह नें मिलकर काम किया. इसके बाद रियासत के पंचम राजा बलभद्र सिंह प्रथम का कार्यकाल १७४४ से १७७० रहा और छठवें राजा बलबंत जैसी धर्मपरायण संतान को जो शासन सौंपा वह बर्ष १७९७ तक अनवरत रहा. राजा बलबंत सिंह के पुत्र और रियासत के सप्तम राजा हिन्दुपत राजा जय सिंह बहुत विख्यात हुए चो १८१८ तक अपने पुण्यप्रताप का जो  अनुवांशिक प्रभाव अपनी पीढियों के रक्त में घोलकर गये हैं वह वर्तमान में भी परिलक्षित दिखाई देता है.

१८१८-१८५६ राघौगढ.की राज परंपरा के आठवें राजा अजीत सिंह नें पंडितो और कवियों को बहुत मान दिया. अंग्रेजों की खिलाफत के दौर में नाना साहब पेशवा तात्या टोपे और इंदौर के सहादत खान को हमेशा समर्थन दिया.                नवें राजा जयमंडल सिंह नें १८५६- १९०० तक बहुत प्रतिभाशाली राजा के रूप में कार्य किया. वे स्वयं भी बहुत विद्वान रहे है.रसायन शास्त्र आयुर्वेद खगोलशास्त्र के अलावा आध्यात्मिक गतिविधियों में उनकी रूचि गंभीर रही. वे घुड.सवारी एथलेटिक्स और योगा में अभिरूचि के धनी रहे. राघौगढ़ राजपरिवार में राजा, महाराज जयमण्डल सिंह जी के बारे में कहा जाता है कि ये अपनी प्रजा का विशेष ध्यान रखते थे और इनके बारे में एक विशेष बात प्रचलित थी कि ये तब तक भोजन नही करते थे जब तक उनकी पूरी प्रजा यानि राघौगढ़ क्षेत्र का हर व्यक्ति भोजन न कर ले। उनमे राजा के भाव नही थे अपितु वे एक पिता की तरह पूरे परिवार यानि राघौगढ़ का ध्यान रखते थे। इनकी बहन राजकुमारी १८७५ में श्योपुर बडौदा राजघराने में ब्याही गईं.

राजा जयमंडल के बेटे और दसवें राजा विक्रमजीत सिंह जी का कार्यकाल १९०० से १९०२ तक रहा. तत्पशचात राजा बहादुर सिंह १९०२ – १९४५   ११वें राजा के रूप में प्रतिष्ठित हुए.

राजा बलभद्रसिंह द्भितीय राघौगढ के बारहवें राजा हुए. १९१६ में जन्में.इनका  विवाह महाराज बहादुरचंद्र मौलेश्वर प्रसाद सिंह की बेटी गिधौर  की राजकुमारी अपर्णा कुमारी से हुआ.. डेली कालेज इंदौर में वे बहुत प्रतिभाशाली छात्र और बेहतरीन खिलाडी. थे.अजमेर के मेयो कालोज से वे पोस्ट डिप्लोमा की उपाधिधारक रहे जहां से उन्हें आल राउंड एफीशिएंसी के लिये गोल्ड मैडल भी मिला. १९५२ में राजा बलभद्र सिंह मध्यप्रदेश विधानसभा में राघौगढ. का प्रतिनिधित्व करते हुए वे सामाजिक और चैरिटैबल गतिविधियों से जुडे. रहे. हिंदुपत विजय और खींची वंशावली में नामक पुस्तकों में राघौगढ से जुडी महत्वपूर्ण बातों को जाना जा सकता है.

Untitledश्री दिग्विजय सिंह राजा बलभद्र सिंह की सबसे बडी संतान हैं. इनके भाई श्री लक्ष्मण सिंह भी राजनीति में प्रमुख रूप से सक्रिय हैं. श्री लक्षमण सिंह सचमुच रामायण पात्र लक्षमण की भांति ही हैं. खींची वंश और राघौगढ. राजघराने की परंपराओं में उनकी निष्ठा बेमिसाल है. श्री दिग्विजय सिंह की चार बेटियां हैं जो सभी भारत के अलग-अलग राजघरानों में ही ब्याही गईं हैं. देशभर के पूर्व राजा-रियासतों मेंराधौगढ. का बहुत मान सम्मान है जो समूचे मालवांचल के लिये गौरव की बात है.

उनके पुत्र श्री जयवर्धन सिंह का जन्म ९ जुलाई १९८६ को हुआ.वे अपनी सब बहनों से छोटे हैं. वे वर्तमान में मध्यप्रदेश की विघान सभा में राघौगढ से निर्वाचित सदस्य है.जयवर्धन सिंह भी अपने पिता की तरह दृढ.और मजबूत विचारों के स्वामी हैं. राघौगढ. की ही नहीं अपितु समूचे राज्य की जनता को आभास है कि वे भविष्य के राजा है.

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राघौगढ. के इतिहास के सिंहावलोकन से सहज ही ज्ञात हो जाता है कि इस राजपरिवार के गौरवशाली इतिहास में हिंदुत्व के मौलिक आचरण और हिन्दू धर्म की सनातन परंपराओं के प्रति आस्था और निष्ठा का बेजोड. संगम रहा है. श्री दिग्विजय सिंह अपनी पत्नी अमृता सिंह के साथ जिस दृढता के साथ हजारों मील की पैदल यात्रा पर निकले हैं उसनें कहीं न कहीं कट्टर हिंदूवादियों के बेलगाम बोलों पर ताला जड. दिया है. कमोवेश बहुतेरे अब यह कहकर श्री सिंह की आलोचना कर सकते हैं कि देश की बहुसंख्यक जनता के मिजाज के चलते उनका रूख बदला है पर वास्तव में ऐसा नहीं है. क्योंकि श्री दिग्विजय सिंह की धर्मनिरपेक्षता नें उनके भीतर हिंदुत्व के मौलिक स्वरूप का आदर करने वाले व्यक्ति का कभी भी बाल भी बांका न किया बल्कि उनके द्वारा व्यक्त धर्म निरपेक्षता उनके मौलिक रूप से हिंदू होने का प्रबल प्रमाण है. हालांकि श्री दिग्विजय सिंह की श्री नर्मदा परिक्रमा यात्रा उनका नितांत निजी पारिवारिक और धार्मिक आराधना को व्यक्त करने वाला कार्य है जिसकी आध्यात्मिक जडे. श्री पीपाजी महाराज के आध्यात्मिक चिंतन और रक्त – मज्जा के सांसारिक रूप से सीधे संबद्धता रखती हैं. यही श्री दिग्विजय सिंह का वह उच्चस्तरीय चिंतन है , जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में साफ- साफ परिलक्षित होता है.

22886015_1823881167631607_147806937911784232_nइस यात्रा के आरंभ से ही यह तथ्य हमारे देश के आधुनिक मीडिया में विवादास्पद रूप से चर्चित है कि श्री दिग्विजय सिंह और रानी अमृता सिंह की श्री नर्मदा परिक्रमा यात्रा को राजनीतिक समझा जाय या धार्मिक यात्रा समझा जाय. जबाब नर्मदांचल के पूर्व सांसद  श्री रामेशवर नीखरा की ओर से आता है जो इस यात्रा में पूरे समय से उनके साथ रहे है .

Nikhra jiश्री नीखरा के अनुसार……………………………..

 “ श्री दिग्विजय सिंह केवल एक शीर्ष राजनीतिज्ञ ही नहीं बल्कि एक परम आध्यात्मिक व्यक्ति भी है जिन्हे श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा करने की प्रेरणा राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में समाहित उन मौलिक धार्मिक विचारों से आई है जो उनके मन-मस्तिष्क में सदा से ही स्थापित है.

दिग्विजयी नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा उनका एक महान धार्मिक कृत्य है जो उनकी मां नर्मदा के प्रति असीम श्रद्धा का परिचायक है. इस प्रकार की यात्रा जो बहुत दुर्गम तथा शारिरिक रूप से असुविधाजनक और कष्टकारी है वह केवल असाधारण आध्यात्मिक शक्ति के बूते ही संपन्न हो पाती है

इसे सचमुच एक सामयिक सत्य के रूप में गृहण किया जाना चाहिये कि देश की राजनीति में जिस शीर्ष स्तर पर वे कार्य करते रहे हैं उस स्तर के किसी भी दल के राजनेता अथवा देश के ज्ञात इतिहास का कोई परम प्रतापी राजा भी नर्मदा मैया की समूची पैदल परिक्रमा नहीं कर सका है जो इस मिथक को तो तोड.ता ही है कि श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा विपन्नों ,     दीनहीन, साधुसंतो  घर परिवार से विरक्त दम्पत्तियों और मलंग बाबाओं की एकछत्र अधिकार है. इस दिग्विजयी यात्रा नें समूचे समाज को यह पारदर्शी संदेश दिया है कि ईश्वर की आराधना करने वाले सब के सब चाहे राजा हों या रंक एक कतार में खडे. हैं.  यह धार्मिक आस्था के राजनीतिक मंतव्य की आसक्ति से निरपेक्ष किन्तु निजी विश्वास और मजबूत मानसिक संकल्पों की परिणिति है. इस दिग्विजयी यात्रा में मेरी सहभागिता निजी संकल्पों के साथ- साथ श्री दिग्विजय सिंह से मिली प्रेरणा और मां नर्मदा की असीम अनुकंपा ही समझता हूं.  

 पूर्व संसद सदस्य श्री रामेश्वर नीखरा जी का उपरोक्त संदेश मां रेवा के कल-कल बहते निर्मल जल जैसा साफ है राजा दिग्विजय सिंह नें श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा का बीडा. निभाकर हिंदुत्व की गहरी छाप छोडी. है साथ ही इस यात्रा के बिषय में सामाज को सोचने के लिये नया आयाम भी दे दिया है.

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गैर- राजनीतिक स्वरूप बनाये रखने और धार्मिक यात्रा का लक्ष्य आध्यात्मिक बनाये रखने में अब तक सफल रहे राजा दिग्विजय और रानी अमृता का यह सफर बडे-छोटे अनेक राजनेताओं की बीच-बीच में हुई उपस्थिति से अपने लक्ष्यों से जरा भी नहीं भटका. ये बात और है कि इस महायात्रा के भविष्य में प्रभाव राजहठी श्री दिग्विजय सिंह के राजनीतिक भविष्य को मजबूती देने में कहीं न कही कोई महती भूमिका जरूर निबाहेंगे.

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