नर्मदा परिक्रमा के पुष्य-महत्व का लोकप्रसार करती दिग्विजयी यात्रा से हिंदुत्व का संवर्धन

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लगातार पैदल चलते हुए श्री दिग्विजय सिंह नें अपनी सहधर्मिणी  श्रीमती अमृता सिंह के साथ  जो सफर शुरू किया उसके १०० दिन पूरे होने वाले हैं. राजहठी श्री दिग्गविजय सिंह ने २४९१ किलोमीटर लम्बी श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा  करने का जो संकल्प उठाया वह उनके हिंदुत्व के मौलिक विचार और धार्मिक आस्था के प्रति प्रतिबद्धता का एक ऐसा नवीनतम उद्धरण है  जो राजनीति में धर्म की श्रेष्ठता के आदर्श को स्थापित करने वाला तो है ही बल्कि देशभर में बिखरे राजवंशो की गाथाओं के इतिहास में भविष्य की किंवदंतियों के रूप में जनमानस के स्मृतिपटल पर अंकित हो जायेगा. देशभर में विभिन्न राजरियासतों के इतिहास में किसी प्रतापी से प्रतापी राजा ने भी पुण्यसलिला श्री नर्मदा की दुर्गम समझी जाने वाली पदयात्रा करने का दुस्साहस नहीं किया. यात्रा जब मध्यप्रदेश  में श्री महेश्वर के घाट पर श्री नर्मदा जी की जिस प्रकार भव्य काकडा. आरती हुई वह अलौकिक नजारा प्रस्तुत करने वाली रही. नदयोग समूह और सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना डा. रागिनी मक्कड. के सहयोग से जो सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुई वे नर्मदा के घाटों से निकले पुष्य-महत्व का लोकप्रसार करते हुए हिंदुत्व की मौलिकता का संवर्धन करती प्रतीत हुई.इस दौरान सभी प्रतिष्ठित कलाकारों नें अहिल्या घाट पर बने मंच पर गणपति स्तुति महारूद्र सत्यम शिवम सुंदरम् मां रेवा थारो पानी अमृत नर्मदा स्तोत्रम जैसे  कार्यक्रमों की सुमधुर प्रस्तुतियां की.

Nadyog 1 AAAइसे दिग्विजयी राजहठ का ही परिणाम समझा जा सकता है कि अब तळक दीनहीनों , साधुसंतो  घर परिवार से विरक्त दम्पत्तियों और मलंग बाबाओं की एकछत्र अधिकार मानी जाने वाली श्री नर्मदा पदयात्रा जैसे महान धार्मिक  दिग्विजयी आचरण को बहुमूल्य सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल हुई है . देशभर के हिन्दू बौद्धिक समुदाय के संपन्न लोगों का ध्यान  इस विराट परिक्रमा की अद्भुत सांस्कृतिकता और धार्मिक महत्व ने अपनी ओर खीचा है .24131464_1856815624338161_1940629398504144412_n

दिग्विजय सिंह की जन्मभूमि राघौगढ स्टेट बहुत छोटी सी रियासत रही लेकिन इतिहास में भी समूचे भारतबर्ष में हिन्दू धर्म-ध्वजा लहराने में अव्वल मानी जाने वाली इस रियासत के लगभग सभी पूर्व राजाओं ने हिन्दुत्व के मौलिक रूप को न केवल आत्मसात किया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में सदैव अगुवाई की है.

राजा बलभद्रसिंह द्भितीय राघौगढ के बारहवें राजा हुए. १९१६ में जन्में.इनका  विवाह महाराज बहादुरचंद्र मौलेश्वर प्रसाद सिंह की बेटी गिधौर  की राजकुमारी अपर्णा कुमारी से हुआ.. डेली कालेज इंदौर में वे बहुत प्रतिभाशाली छात्र और बेहतरीन खिलाडी. थे.अजमेर के मेयो कालोज से वे पोस्ट डिप्लोमा की उपाधिधारक रहे जहां से उन्हें आल राउंड एफीशिएंसी के लिये गोल्ड मैडल भी मिला. १९५२ में राजा बलभद्र सिंह मध्यप्रदेश विधानसभा में राघौगढ. का प्रतिनिधित्व करते हुए वे सामाजिक और चैरिटैबल गतिविधियों से जुडे. रहे. हिंदुपत विजय और खींची वंशावली में नामक पुस्तकों में राघौगढ से जुडी महत्वपूर्ण बातों को जाना जा सकता है.

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श्री जयवर्धन सिंह

श्री दिग्विजय सिंह राजा बलभद्र सिंह की सबसे बडी संतान हैं. इनके भाई श्री लक्ष्मण सिंह भी राजनीति में प्रमुख रूप से सक्रिय हैं. श्री लक्षमण सिंह सचमुच रामायण पात्र लक्षमण की भांति ही हैं. खींची वंश और राघौगढ. राजघराने की परंपराओं में उनकी निष्ठा बेमिसाल है. श्री दिग्विजय सिंह की चार बेटियां हैं जो सभी भारत के अलग-अलग राजघरानों में ही ब्याही गईं हैं. देशभर के पूर्व राजा-रियासतों मेंराधौगढ. का बहुत मान सम्मान है जो समूचे मालवांचल के लिये गौरव की बात है. उनके पुत्र श्री जयवर्धन सिंह का जन्म ९ जुलाई १९८६ को हुआ.वे अपनी सब बहनों से छोटे हैं. वे वर्तमान में मध्यप्रदेश की विघान सभा में राघौगढ से निर्वाचित सदस्य है.जयवर्धन सिंह भी अपने पिता की तरह दृढ.और मजबूत विचारों के स्वामी हैं. राघौगढ. की ही नहीं अपितु समूचे राज्य की जनता को आभास है कि वे भविष्य के राजा है.

Raghogarh Fortराघौगढ. के इतिहास के अध्ययन से सहज ही ज्ञात हो जाता है कि इस राजपरिवार के गौरवशाली इतिहास में हिंदुत्व के मौलिक आचरण और हिन्दू धर्म की सनातन परंपराओं के प्रति आस्था और निष्ठा का बेजोड. संगम रहा है. श्री दिग्विजय सिंह अपनी पत्नी अमृता सिंह के साथ जिस दृढता के साथ हजारों मील की पैदल यात्रा पर निकले हैं उसनें कहीं न कहीं कट्टर हिंदूवादियों के बेलगाम बोलों पर ताला जड. दिया है. कमोवेश बहुतेरे अब यह कहकर श्री सिंह की आलोचना कर सकते हैं कि देश की बहुसंख्यक जनता के मिजाज के चलते उनका रूख बदला है पर वास्तव में ऐसा नहीं है. क्योंकि श्री दिग्विजय सिंह की धर्मनिरपेक्षता नें उनके भीतर हिंदुत्व के मौलिक स्वरूप का आदर करने वाले व्यक्ति का कभी भी बाल भी बांका न किया बल्कि उनके द्वारा व्यक्त धर्म निरपेक्षता उनके मौलिक रूप से हिंदू होने का प्रबल प्रमाण है. हालांकि श्री दिग्विजय सिंह की श्री नर्मदा परिक्रमा यात्रा उनका नितांत निजी पारिवारिक और धार्मिक आराधना को व्यक्त करने वाला कार्य है जिसकी आध्यात्मिक जडे. श्री पीपाजी महाराज के आध्यात्मिक चिंतन और रक्त – मज्जा के सांसारिक रूप से सीधे संबद्धता रखती हैं. यही श्री दिग्विजय सिंह का वह उच्चस्तरीय चिंतन है , जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में साफ- साफ परिलक्षित होता है.

Aइस यात्रा के आरंभ से ही यह तथ्य हमारे देश के आधुनिक मीडिया में विवादास्पद रूप से चर्चित है कि श्री दिग्विजय सिंह और रानी अमृता सिंह की श्री नर्मदा परिक्रमा यात्रा को राजनीतिक समझा जाय या धार्मिक यात्रा समझा जाय. जबाब नर्मदांचल के पूर्व सांसद  श्री रामेशवर नीखरा की ओर से आता है जो इस यात्रा में पूरे समय से उनके साथ रहे है .श्री नीखरा के अनुसार……………………………..

 “ श्री दिग्विजय सिंह केवल एक शीर्ष राजनीतिज्ञ ही नहीं बल्कि एक परम आध्यात्मिक व्यक्ति भी है जिन्हे श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा करने की प्रेरणा राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में समाहित उन मौलिक धार्मिक विचारों से आई है जो उनके मन-मस्तिष्क में सदा से ही स्थापित है.

दिग्विजयी नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा उनका एक महान धार्मिक कृत्य है जो उनकी मां नर्मदा के प्रति असीम श्रद्धा का परिचायक है. इस प्रकार की यात्रा जो बहुत दुर्गम तथा शारिरिक रूप से असुविधाजनक और कष्टकारी है वह केवल असाधारण आध्यात्मिक शक्ति के बूते ही संपन्न हो पाती है

 “ इसे सचमुच एक सामयिक सत्य के रूप में गृहण किया जाना चाहिये कि देश की राजनीति में जिस शीर्ष स्तर पर वे कार्य करते रहे हैं उस स्तर के किसी भी दल के राजनेता अथवा देश के ज्ञात इतिहास का कोई परम प्रतापी राजा भी नर्मदा मैया की समूची पैदल परिक्रमा नहीं कर सका है जो इस मिथक को तो तोड.ता ही है कि श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा विपन्नों ,     दीनहीन, साधुसंतो  घर परिवार से विरक्त दम्पत्तियों और मलंग बाबाओं की एकछत्र अधिकार है. इस दिग्विजयी यात्रा नें समूचे समाज को यह पारदर्शी संदेश दिया है कि ईश्वर की आराधना करने वाले सब के सब चाहे राजा हों या रंक एक कतार में खडे. हैं.  यह धार्मिक आस्था के राजनीतिक मंतव्य की आसक्ति से निरपेक्ष किन्तु निजी विश्वास और मजबूत मानसिक संकल्पों की परिणिति है. इस दिग्विजयी यात्रा में मेरी सहभागिता निजी संकल्पों के साथ- साथ श्री दिग्विजय सिंह से मिली प्रेरणा और मां नर्मदा की असीम अनुकंपा ही समझता हूं.  

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नर्मदांचल के सांसद श्री रामेश्वर नीखरा दिग्विजयी नर्मदा परिक्रमा पदयात्र के पल-पल के साक्षीदार हैं . श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा के सांस्कृतिक परंपरा की लोकव्यापी नई छवि से बहुत उत्साहित भी हैं.

पूर्व संसद सदस्य श्री रामेश्वर नीखरा जी का उपरोक्त संदेश मां रेवा के कल-कल बहते निर्मल जल जैसा साफ है राजा दिग्विजय सिंह नें श्री नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा का बीडा. निभाकर हिंदुत्व की गहरी छाप छोडी. है साथ ही इस यात्रा के बिषय में सामाज को सोचने के लिये नया आयाम भी दे दिया है.

गैर- राजनीतिक स्वरूप बनाये रखने और धार्मिक यात्रा का लक्ष्य आध्यात्मिक बनाये रखने में अब तक सफल रहे राजा दिग्विजय और रानी अमृता का यह सफर बडे-छोटे अनेक राजनेताओं की बीच-बीच में हुई उपस्थिति से अपने लक्ष्यों से जरा भी नहीं भटका. श्री दिग्विजय सिंह के लिये इस यात्रा की सबसे बडी. उपलब्धि यह भी रही कि उनके संकल्प की दृढ.ता का लोहा उनके विरोधी भी मानने लगे हैं. विभिन्न राजनीतिक विचारधारा के प्रतिष्ठित व्यक्तियों नें इस यात्रा में पैदल चलकर श्री सिंह को बहुत संबल दिया है. बात और है कि इस महायात्रा के भविष्य में पुष्यकारी प्रभाव  राजहठी श्री दिग्विजय सिंह के राजनीतिक भविष्य को मजबूती देने में कहीं न कही कोई महती भूमिका जरूर निबाहेंगे.

आलेख – नीरज ओमप्रकाश श्रीवास्तव की कलम से

छायांकन- प्रताप सिंह राघौगढ.