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बिहार में 2015 में जब विधानसभा के चुनाव हुए तो लालू यादव और नीतीश कुमार ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. दोनों को जीत भी हासिल हुई और नीतीश कुमार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन गए थे. करीब 20 महीने तक तो थोड़ी बहुत उठापटक के साथ सरकार चल रही थी, लेकिन जुलाई 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से खुद को अलग कर लिया. वजह लालू यादव और उनके परिवार के ऊपर लगा भ्रष्टाचार का आरोप था. नीतीश कुमार ने कहा था कि उनकी अंतरात्मा इस बात की गवाही नहीं दे रही है कि वो इस गठबंधन में बने रहें.

नीतीश जब तक महागठबंधन तोड़कर अंतरात्मा की शुद्धि करते, उनके सामने सृजन घोटाले का जिन्न खड़ा हो गया, जो बिहार के अब तक के घोटालों में सबसे बड़ा था. इस घोटाले को अंजाम दिया था भागलपुर की सृजन संस्था की मनोरमा देवी ने, जिसकी मौत हो चुकी है. इस घोटाले में सरकारी पैसे का हेरफेर किया गया था, जिसको लेकर राजद और कांग्रेस नेताओं ने नीतीश कुमार पर हमला बोल दिया था. जब कोई चारा नहीं बचा, तो नीतीश कुमार को इस मामले की जांच के लिए सीबीआई को लिखना पड़ा.

पांच महीने की जांच के बाद भी सीबीआई ये नहीं बता सकी है कि इस पूरे घोटाले में कितने पैसे का हेर-फेर हुआ है. वहीं इस केस की जांच में तेजी लाने के लिए दिल्ली से सीबीआई के एसपी कुलदीप बालियान समेत आधा दर्जन अधिकारी भागलपुर में हैं. वो वहां दस्तावेज जुटा रहे हैं, पूछताछ कर रहे हैं और चार्जशीट तैयार कर रहे हैं.

सीबीआई पूरे मामले की जांच कर रही है और कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं.

सीबीआई ने अब तक बैंक ऑफ बड़ौदा के रिटायर्ड मुख्य प्रबंधक अरुण कुमार सिंह की नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी। ये सृजन घोटाले के आरोपी हैं और , एडीएम रैंक के कल्याण अधिकारी अरुण कुमार और कई अन्य अधिकारियों को गिरफ्तार किया है, जिनकी जमानत खारिज हो चुकी है. इसके अलावा सीबीआई ने जिला भू अर्जन कार्यालय के नाजिर (अब निलंबित) राकेश झा को भी गिरफ्तार कर लिया है.

सरकारी पैसे को ब्याज पर चलाने का था पूरा खेल

कोई भी सरकार अपनी योजनाओं को चलाने के लिए आवंटित फंड को जिले के बैंकों में रखती है. बिहार के भागलपुर में भी ये पैसे रखे गए थे. पैसे दो बैंक अकाउंट में थे. एक बैंक था इंडियन ओवरसीज बैंक और दूसरा था बैंक ऑफ बड़ौदा. जांच के दौरान सामने आया कि सृजन नाम के एक एनजीओ ने बैंक अधिकारियों की मदद से फर्जी साइन के जरिए इन बैंकों से सरकारी पैसे निकालने शुरू कर दिए. ये पैसे सृजन के खाते में आ रहे थे, जिन्हें वो रियल स्टेट कारोबार में लगाने के साथ ही ब्याज पर चला रहा था. पैसे के निवेश से जो भी फायदा होता था, वो सृजन के खाते में जमा होता था. सरकारी पैसे का एनजीओ के खाते में ट्रांसफर होने का पता इसलिए नहीं चलता था, क्योंकि जब भी एनजीओ, बैंक अधिकारियों या किसी बड़े प्रशासनिक अधिकारी को इस बात की भनक लगती थी कि सरकार को पैसे की जरूरत पड़ सकती है, पैसे फिर से सरकारी खाते में जमा कर दिए जाते थे और किसी को पता भी नहीं चलता था. मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि ये घोटाला पिछले आठ सालों से यानी 2009 से चल रहा है और इसकी वजह से सरकार को 600 से 2000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हुआ है.

चेक बाउंस हुआ तो सामने आया घोटाला

जुलाई में भागलपुर प्रशासन ने एक जमीन का अधिग्रहण किया, जिसके भुगतान के लिए पैसे की जरूरत थी. जब पैसा निकालने के लिए डीएम आदेश तितरमारे की ओर से बैंक में चेक लगाया गया तो पैसा न होने की वजह से वो बाउंस हो गया. चेक बाउंस होने के बाद भागलपुर डीएम ने केस दर्ज करवाया. मामसा सामने आने के बाद से अब तक कुल सात एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और 13 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है. जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें रिटायर्ड सबडिवीजनल ऑडिटर सतीश चंद्र झा, सृजन महिला विकास सहयोग समिति की प्रबंधक सरिता झा, भागलपुर कलेक्ट्रेट का क्लर्क और डीएम का स्टेनोग्राफर प्रेम कुमार, डीआरडीए का हेड क्लर्क राकेश यादव, डिपार्टमेंट ऑफ लैंड रिसोर्जेज का हेड क्लर्क राकेश झा, इंडियन बैंक का क्लर्क अजय पांडेय और प्रिंटिंग प्रेस के मालिक वंशीधर झा के अलावा तीन और लोग शामिल हैं.

ठेला लगाती थी महिला, बेटे-बहू बने करोड़पति

मनोरमा (दाएं) की मौत के बाद उनकी बहू प्रिया (बाएं) सृजन संस्था की सचिव हैं.

अवधेश कुमार रांची में लाह अनुसंधान संस्थान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में नौकरी करते थे. 1991 में अचानक उनकी मौत हो गई. पति की मौत के बाद उनकी पत्नी मनोरमा देवी अपने छह बच्चों को लेकर भागलपुर आ गईं. वहां मनोरमा देवी ने सबौर में किराए का मकान लिया और परिवार को पालने की कोशिश की. उन्होंने ठेले पर कपड़ा बेचने का काम शुरू किया. धीरे-धीरे सिलाई-कढ़ाई का काम भी शुरू हो गया. देखते ही देखते दो साल में मनोरमा के साथ कई और महिलाएं भी शामिल हो गईं. 1993-94 में मनोरमा देवी ने दो महिलाओं सुनीता और सरिता के साथ भागलपुर में ही सृजन संस्था की शुरुआत की. महिलाओं की संख्या बढ़ने और काम अधिक आने पर मनोरमा ने रजंदीपुर पैक्स से 10 हजार रुपये कर्ज लिया. कपड़े सिलने और उनकी बिक्री बढ़ने पर मनोरमा ने और महिलाओं को अपनी संस्था से जोड़ना शुरू कर दिया. 1996 में सृजन को सहकारिता विभाग में को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में मान्यता भी मिल गई और मनोरमा इस संस्था की सचिव बन गईं. सहकारिता बैंक ने सृजन संस्था के नाम पर 40 हजार रुपये का लोन पास कर दिया. को-ऑपरेटिव सोसाइटी के तौर पर संस्था में महिलाओं के पैसे भी जमा करवाए जाने लगे और उन्हें इसपर ब्याज भी दिया जाने लगा. इसके अलावा जरूरतमंद महिलाओं को ये संस्था कर्ज भी देने लगी. मनोरमा देवी ने सृजन संस्था चलाने के लिए सरकारी मदद से भागलपुर में 35 साल की लीज पर 200 रुपये महीना के किराए पर टायसम भवन को ले लिया, जिसकी लीज की इजाजत खुद डीएम ने दी थी. इसके बाद संस्था के अकाउंट में महिलाओं की सहायता के लिए सरकारी पैसा आना शुरू हो गया. सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से 500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि इस अकाउंट में जमा हो गई और इस पैसे से ब्याज कमाकर अधिकारी मालामाल होने लगे.

प्रिंटिंग प्रेस में छपती थी सरकारी पासबुक में डिटेल



2007-2008 में जब सृजन को-ऑपरेटिव बैंक खुल गया, तो भागलपुर के ट्रेजरी में रखा पैसा सृजन को-ऑपरेटिव में ट्रांसफर किया जाने लगा. जब भी संबंधित विभाग को खाते की डिटेल चाहिए होती थी, तो एक प्रिंटिंग प्रेस में पासबुक में एंट्री दर्ज कर दी जाती थी, जिसका मालिक वंशीधर झा था. इसमें एनजीओ के लिए पैसा निकासी और एनजीओ की ओर से पैसा वापसी की डिटेल गायब कर दी जाती थी. इस तरह से अवैध पैसा निकालना और जरूरत पर उसे खाते में ट्रांसफर कर देने की डिटेल पासबुक में दर्ज नहीं हो पाती थी.

दो तरीकों से होती थी अवैध निकासी

सृजन एनजीओ आटा, चावल, दाल, पापड़ और अन्य घरेलू सामान बनाकर बेचता है.

आज तक को जानकारी देते हुए भागलपुर के एसएसपी मनोज कुमार ने बताया था कि सृजन संस्था दो तरीकों से सरकारी खजाने से अवैध निकासी का काम करती थी. एक तरीका था स्वीप मोड और दूसरा था चेक मोड. स्वीप मोड के जरिए भारी रकम राज्य सरकार या केंद्र सरकार द्वारा भागलपुर जिले के सरकारी खातों में जमा कराए जाते थे. स्वीप मोड में राज्य सरकार या केंद्र सरकार एक पत्र के माध्यम से बैंक को सूचित करती थी कितनी राशि बैंक में जमा करा दी गई है. बैंक के अधिकारी भी इस पूरे गोरखधंधे में शामिल थे. वह सरकारी खाते में इस पैसे को जमा नहीं दिखाकर सृजन के खाते में इस पूरे पैसे को जमा कर दिया करते थे. दूसरा तरीका था चेक मोड, जहां पर राज्य सरकार या केंद्र सरकार जो भी पैसे भागलपुर जिले के सरकारी खातों में जमा कराना था वह चेक के माध्यम से किया जाता था. एक बार सरकारी खाते में चेक जमा हो जाता था तो फिर जिलाधिकारी के दफ्तर में शामिल कुछ लोग जो कि इस गोरखधंधे में हिस्सा थे जिलाधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर से अगले दिन वही राशि सृजन के अकाउंट में जमा करा दिया करते थे.

2008 में भी सामने आया था मामला



सृजन संस्था की ओर से किया जा रहा यह घोटाला पहली बार 2008 में सामने आया था. उस वक्त राज्य में जदयू और बीजेपी की सरकार थी और वित्त मंत्रालय का जिम्मा अब के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के पास था. बिहार के अखबार प्रभात खबर की रिपोर्ट के मुताबिक 2008 में ही ऑडिटर ने आपत्ति जताई थी कि सरकार का पैसा को-ऑपरेटिव बैंक में कैसे जमा हो रहा है? सवाल उठने के बाद तत्कालीन एसडीएम विपिन कुमार ने सभी प्रखंड के अधिकारियों को पत्र लिखकर कहा था कि सृजन के खाते में पैसे जमा न करें. 25 जुलाई, 2013 को भारतीय रिजर्व बैंक ने बिहार सरकार से कहा था कि इस को-ऑपरेटिव बैंक की जांच करें. रिजर्व बैंक का आदेश है कि अगर कोई भी मामला 30 करोड़ रुपये से अधिक की गड़बड़ी का होगा, तो मामले की जांच सीबीआई करेगी. वर्ष 2013 में भागलपुर के तत्कालीन डीएम प्रेम सिंह मीणा ने सृजन की बैंकिंग प्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए जांच टीम गठित कर दी थी. राजद मुखिया लालू यादव ने भी कहा था कि जुलाई 2013 में एक अखबार में इस घोटाले के बारे में छपा था. लालू यादव का दावा था कि संजीव कुमार नाम के आदमी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक को भी पत्र लिखा था.

मनोरमा की मौत के बाद बदले हालात

बीजेपी नेताओं के साथ मनोरमा की फोटो दिखाकर विपक्ष नीतीश और बीजेपी पर हमलावर है.

सृजन संस्था की संस्थापक मनोरमा देवी की फरवरी 2017 में मौत हो गई. इसके बाद मनोरमा के बेटे अमित और बहू प्रिया के हाथ में संस्था की कमान आ गई. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मनोरमा तो जरूरत पड़ने पर सरकारी पैसे लौटा देती थी, लेकिन जब मनोरमा की मौत हो गई तो जिन लोगों ने पैसे लिए थे, लौटाने से इनकार कर दिए. इसके बाद हालात बिगड़ गए. पिछले हफ्ते जो चेक बाउंस हुआ, उसके पीछे भी यही कहानी थी कि ट्रेजरी के पैसे बैंक में जमा नहीं हुए. मामला सामने आने के बाद अमित और प्रिया फरार हैं, जिनके खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया गया है.

हमलावर थे लालू और तेजस्वी



इस पूरे घोटाले में बीजेपी और जदयू के नेताओं पर भी ऊंगली उठने लगी है. बिहार में 2005 से ही नीतीश कुमार की सरकार है. जिस दौरान सृजन की ओर से ये घोटाला किया गया, वित्त मंत्रालय बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी के जिम्मे था. लालू का आरोप था कि सुशील मोदी की मदद से ही इस घोटाले को अंजाम दिया गया. लालू ने इस घोटाले में नीतीश कुमार, सुशील मोदी, शाहनवाज हुसैन, गिरिराज किशोर, निशिकांत दुबे और विपिन बिहारी पर भी मिलीभगत का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि नीतीश ने इस घोटाले की जांच से खुद को बचाने के मकसद से ही बीजेपी के साथ हाथ मिलाया है. लालू ने ये भी कहा था कि जैसे चारा घोटाले के दौरान मुख्यमंत्री आवास पर छापेमारी की गई थी, वैसे ही इस मामले में भी कार्रवाई की जाए. तमाम आरोप लगने के बाद नीतीश कुमार ने 17 अगस्त को मामले की सीबीआई जांच के लिए सिफारिश कर दी थी, जिसके बाद सीबीआई पूरे मामले की जांच कर रही है. हालांकि पांच महीने के बाद भी सीबीआई ये नहीं बता पाई है कि इस पूरे घोटाले में कितने पैसे की हेर फेर हुई है.

सहरसा और बांका में भी हुई पैसे की हेराफेरी

सृजन घोटाले का दायरा भागलपुर से बढ़कर सहरसा, सुपौल और बांका तक पहुंच गया है. बिहार के डीजीपी पीके ठाकुर के मुताबिक अब तक 624.86 करोड़ रुपये भागलपुर के विभिन्न सरकारी विभागों, 162.92 करोड़ रुपये सहरसा के भू अर्जन शाखा के और 83.10 करोड़ रुपये बांका के भू अर्जन शाखा से ट्रांसफर हुए हैं. मामले में अब तक कुल 11 एफआईआर दर्ज हुई हैं, जिसमें 18 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. डीजीपी के मुताबिक घोटाले में शामिल होने के आरोप में जिला कल्याण पदाधिकारी सहित कुल 5 पदाधिकारियों और कर्मियों को निलंबित किया गया है.

घोटाले के एक आरोपी की हुई थी मौत

घोटाले के आरोप में गिरफ्तार महेश मंडल की इलाज के दौरान 20 अगस्त 2017 को मौत हो गई थी . समाज कल्याण विभाग से निलंबित महेश मंडल को 13 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद 15 अगस्त को कोर्ट ने उसे जेल भेज दिया. तबीयत खराब होने की दलील देने पर कोर्ट ने महेश को अस्पताल में भर्ती करवाने का आदेश दिया था. डॉक्टरों के मुताबिक महेश ने किडनी खराब होने की शिकायत की थी. महेश को शुगर की भी दिक्कत थी.  18 और 19 अगस्त को महेश को मायागंज अस्पताल भेजा गया. 20 अगस्त को तबीयत ठीक होने के बाद महेश मंडल को वापस जेल भेज दिया गया. रात को तबीयत और भी खराब हो गई, जिसके बाद महेश को अस्पताल लाया गया, जहां रात में ही महेश की मौत हो गई.