अख़बारों में पाठक संख्या को लेकर दिलचस्प शीतयुद्ध
——————————————————–

आलेख- श्रीप्रकाश दीक्षित
अख़बारों की बिक्री और पाठक संख्या के दावों की पड़ताल करने वाली विभिन्न एजेंसियों के सर्वे की मीडिया मालिक अपने अपने हिसाब से व्याख्या कर खुद को प्रतिद्वंदी से आगे बताते रहते हैं. कमोबेश यही हालत खबरिया चैनलों की है जो अपने को दूसरों से आगे बताने के लिए दर्शकों को अजब-गजब हथकंडों से गुमराह करते हैं. इन सर्वे के आधार पर पाठकों और दर्शकों को भरमाने में भोपाल [मध्यप्रदेश] के अख़बार और चैनल भी पीछे नहीं हैं और अपना महिमामंडन खुद कर लिया करते हैं.
इधर कुछ दिनों से रीडरशिप सर्वे ऑफ़ इंडिया [IRS-2017] के सर्वेक्षण के हवाले से विज्ञापनबाजी कर पाठक संख्या के लम्बे चौड़े दावे ठोंके जा रहे हैं. यह संस्था बिक्री के बजाय पाठक संख्या की पड़ताल करती है. इसलिए दैनिक भास्कर और पत्रिका अपने पाठकों को शहरी और ग्रामीण तथा महिला और पुरुष में विभाजित कर खुद को बड़ा साबित करने में जुटे हैं. लगता है प्रतिदिन खुद को देश का सबसे बड़ा अख़बार घोषित करने वाला दैनिक भास्कर पाठक संख्या के मामले में पिछड़ रहा है. तभी उसने केवल शहरी पाठक संख्या का हवाला देकर खुद को नंबर एक घोषित किया है.
उधर पत्रिका मध्यप्रदेश में कमजोर होने से राजस्थान में नंबर एक होने का दावा कर संतुष्ट है.यह अख़बार दैनिक भास्कर को करीबी प्रतिद्वंदी मानकर अपने प्रचार में इसका उल्लेख कर रहा है.इसके बरक्स लगता है दैनिक भास्कर को इससे अपनी तुलना पसंद नहीं है सो इसके विज्ञापन में पत्रिका का नाम ही नहीं है. नईदुनिया चूँकि यूपी के जागरण समूह का अख़बार हो गया है और एमपी में फिलहाल तीसरे या चौथे नंबर पर है सो यह देश के दस बड़े अख़बारों में अपने को शुमार कर संतुष्ट है. समूह ने दस बड़े अखबार में शुमार होने को उपलब्धि मान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से केक कटवा इसे सेलेब्रेट भी कर लिया है..!