शिवराजसिंह चौहान के कारण मध्यप्रदेश में भाजपा-संघ कार्यकर्ताओं के उत्साह में की कमी..

भोपाल. मध्यप्रदेश में 15 बर्षों से सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान नेतृत्व को  चुनौती देने वाला कोई चेहरा राज्य भारतीय जनता पार्टी में दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है.बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को विश्वास में लेकर चलने वाले श्री शिवराज सिंह चौहान से राज्यभर में इन दिनों भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता खुश नहीं हैं और यही कारण है कि पार्टी के लिये चहुंओर सकारात्मक वातावरण होने के बाबजूद मध्यप्रदेश में हाशिये पर पडी. कांग्रेस उपचुनावों में पार्टी को शिकस्त दे पाने में कामयाब हो गई. भाजपा के आरंभ से वर्तमान तक पार्टी का साथ देने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं और पुराने भाजपा नेताओं में राज्य में होनें वाले आगामी चुनावों के लिये उत्साह की कमी देखी जा रही है. समय रहते भाजपा नें इन कार्यकर्ताओं को नहीं साधा तो 2018 के चुनावों में तो भाजपा को आशा के विपरीत परिणाम मिलना अवश्यभावी है, वहीं 2019 के आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी की एनडीए सरकार की वापिसी के सवाल पर गहरा प्रश्नचिन्ह लग सकता है.

मध्यप्रदेश राज्य में कांग्रेस पार्टी की खेमेबाजी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में सत्ता के लिये परस्पर संघर्ष के कारण मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद से 2003 में सत्ता खोनें तक सबसे बडी.पार्टी समझी जाने वाली कांग्रेस तिनका –तिनका होकर बिखर गई. 2003 के आरंभ तक भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता संसाधनों और पर्याप्त धन के बिना भी मात्र पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता के चलते पूरे मनोयोग से काम करते रहे हैं. उधर भारतीय जनता पार्टी की रीढ.की हड्डी समझी जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक बिना सत्ता और सम्मान की अपेक्षा किये मात्र विचारधारा और पार्टी के विस्तार के लिये पूरे उत्साह से कांग्रसियों की फौज का सामना करते रहे है. वही कारण था कि राज्यभर में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और लगातार विजय का वरण करती हुई भारतीय जनता पार्टी वर्तमान स्थिति में पहुँची है.

2003 में मध्यप्रदेश में स्वर्गीय भाजपा नेता प्रमोद महाजन और वर्तमान में संघ में उपेक्षा भोग रहे श्री संजय जोशी के प्रदुर्भाव से भाजपा की संघ नीति में सेंधमारी शुरू हुई और भाजपा का कथित रूप से कांग्रेसीकरण आरंभ हुआ. आरंभ में भाजपा एक कैडरवेस दल था . लेकिन चमचागिरी और चाटूकारिता धीरे-धीरे मध्यप्रदेश की भाजपा में घर बनानें लगी. सुश्री उमा श्री भारती के सत्ता से निर्वासन के बाद श्री बाबूलाल गौर का मुख्यमंत्री के रूप में आना  और जाना प्रदेश में भाजपा की किरकिरी का कारण बना. बाद में श्री शिवराज सिंह चौहान का श्यामला पहाडी.पर विराजना राज्य में भाजपा के कांग्रसीकरण की बुनियाद का सबसे सशक्त पत्थर माना जा सकता है. लेकिन पार्टी निष्ठा के मजबूत संस्कारों में बंधी भाजपा नें नई व्यवस्था को धीरे-धीरे आत्मसात करना आरंभ कर दिया.

Photo by Ashwani Nagpal

  मध्यप्रदेश राज्यभर में श्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा के एक निष्ठावान कार्यक्ता के रूप में बहुत लोकप्रिय और मजबूत मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हुए जिन्हें सबसे लम्बे समय तक मध्यप्रदेश जैसे राज्य का लोकतांत्रिक मुखिया होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. उनके नेतृत्व में राज्य में भाजपा की तीन-तीन बार सरकार बनी साथ ही वे संगठन से जुडे. शीर्ष नेताओं के बहुत कृपा पात्र रहे हैं. किन्तु जिस कांग्रेसीकरण किस्म की की विद्या से वे राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में अवतरित हुए थे उस विद्या के प्रभाव से वे मुक्त न हो सके. शनै-शनै उनके आचरण में पार्टी के कार्यकर्ताओं के मध्य भेदभाव और अपने-पराये की भावना बढने लगी.  उनकी मुख्यमंत्री के रूप में आरंभिक दिनों में भूमिका से यह समझा जाता रहा कि ऐसा होना सहज और स्वाहाविक है. परन्तु कालांतर में उनका यह स्वहाव बन गया कि वे दल में कतिपय चाटूकारों को महत्व देने लगे और अपने- पराये के आधार पर दल के कार्यकर्ताओं में रेवडि.यां बांटने का दौर आरंभ हो गया. मुख्यमत्री के रूप में उनके दूसरे पांच साल के दौर में तो उन्होंने बाकायदा राज्यभर में अपने चहेतों का एक ऐसा समूह गठित कर लिया जिसने राज्यभर में पुराने और निष्ठावान भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं को किनारे लगाना आरंभ कर दिया. देखते ही देखते मुख्यमंत्री के रूप में पांचबर्षीय तीसरा कार्यकाल हासिल करने वाले शिवराज सिंह चौहान ने राज्यभर में भाजपा और संघ के परंपरागत अधोसंरचना को तहस-नहस कर राज्यभर में भाजपा के ऐसे नेताओं की फौज खडी.कर दी जो पुराने कार्यकर्ता और संघियों से बिचकने लगी. इस दौर तक लगभग सभी पुराने बुजुर्गबार और निष्ठावानों को सत्ता की मलाईदार परत से मीलों दूर खदेडा.जा चुका था. पुराने कार्यकर्ता अपना भविष्य असुरक्षित जानकर पार्टी की बुनियादी सेवा से धीरे धीरे अलहदा होते चले गये.

 ताजा हालात बेहद चौंकाने वाले है जबकि प्रजातांत्रिक चुनावों के प्रचार के पारंपरिक तरीकों के अलावा सोशल मीडिया और इलेक्ट्रनिक तकनीक अपने पूरे चरम पर है. ऐसे में में भाजपा की मुख्य विरोधी कांग्रेस में कार्यकर्ता स्तर पर एकजुटता देखी जा रही है. सत्ता के सुख से वंचित कांग्रेस के नेता अपनी परस्पर प्रतिद्वन्दिता छोड.कर साख आ रहे हैं. राज्य में अनेक विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों नें मतदातों के समक्ष दस्तक देना भी आरंभ कर दिया है. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में पिछले तमाम उपचुनावों में मिली जीत नें उत्साह भर दिया है. राज्यकांग्रेस के शीर्ष स्तर पर पर भी नेताओं में एकजुटता दिखाई देने लगी है. मृत दिखाई दे रहे कांग्रेस संगठन में जान फूंकने के लिये कार्यकर्ता परस्पर मतभेदों से परे मैदान में उतर आये हैं. लेकिन उदाहरण के तौर पर श्री शिवराज सिंह का गृह क्षेत्र माने जाने वाले विदिशा-रायसेन संसदीय क्षेत्र की विधानसभावार यदि भाजपा कार्यकर्ताओं की मनस्थिति को देखा जाये तो उनमें पूर्ववत उत्साह गायब है..तहसील और मंडल स्तर के कतिपय नेताओं को छोड.कर भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं को यह बोध हो चुका है कि तीन बार मुख्यमंत्री बनने के वावजूद यदि अंचल के बुनियादी कार्यकर्ता उपेक्षित ही रहेंगे तो भविष्य में शिवराज सिंह की फिर से सरकार बनबाने से कार्यकर्ताओं को कोई सम्मान मिलने वाला नहीं है.

  बताया जाता है कि श्री शिवराज सिंह चौहान अपने इने-गिने चाटूकारों से घिरे हैं. वे भाजपा, संघ और अनुषांगिक संगठनों से जुडे.निष्ठावान कार्यकर्ताओं की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं. मामा के रूप में उनकी रटी-रटाई शैली के भाषण बेहद उबाऊ लगने लगे हैं. कार्यकर्ताओं के बीच भेदभाव के कारण विभिन्न जिलों में केवल चाटूकार किस्म के नेता ही उनके आगे-पीछे नजर आते है. निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बनी रही तो आने वाले दिनों में इसके परिणाम आमचुनावों के परिणामों पर गहरा असर दिखायेंगे.

( नीरज ओमप्रकाश श्रीवास्तव की रपट )