मध्य प्रदेश में राज्य सेवाओं में सबसे रुतबे वाली नौकरी है डिप्टी कलेक्टर की. और ये नौकरी आपको तभी मिलती है जब आप एक लंबी और जटिल परीक्षा पास कर लें. ये परीक्षा कराता है मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग जिसका मुख्यालय है इंदौर में. इस लोक सेवा आयोग से लोग हमेशा तंग रहते हैं. कभी परीक्षा नहीं होती, तो कभी रिज़ल्ट नहीं आता, तो कभी कॉल लेटर नहीं मिलता. इसका ताज़ा कारनामा भी ऐसा ही है. लोक सेवा आयोग ने 18 फरवरी, 2018 को राज्य सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षा कराई थी. और इसके तीन दिन बाद से, यानी 21 फरवरी से न परीक्षा देने वाले सोए हैं, और न ही आयोग चैन से बैठ पा रहा है. 21 फरवरी को आयोग ने परीक्षा की ‘आंसर की’ (सवालों के सही जवाब) जारी की थी.

परीक्षा देने वाले आवेदक और आयोग परीक्षा में पूछे गए सवालों के सही जवाब पर एकमत नहीं हैं. लेकिन आयोग शिकायत सुनने की जगह ‘अंतिम निर्णय’ वाली ज़िद पर अड़ा है.

21 फरवरी को जब आयोग ने प्रावधिक उत्तर कुंजी माने प्रोविज़नल आंसर की जारी की. इसमें 15 मोटी-मोटी गलतियां थीं. कुछ मिसालें हम यहां दे रहे हैं –

1. आयोग के मुताबिक भारत छोड़ो का नारा जवाहरलाल नेहरू ने दिया था. जबकि सही जवाब है यूसुफ मेहर अली. अली एक समाजवादी नेता थे और उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था.
2. आयोग के मुताबिक मध्य प्रदेश का जलियांवाला बाग झाबुआ नरसंहार को कहा जाता है. ये भी गलत है. सही जवाब है चरण पादुका नरसंहार, जो बुंदेलखंड में हुआ था.
3. आयोग के मुताबिक प्लान्ड इकॉनमी ऑफ इंडिया जीडी बिरला ने लिखी थी. इसका सही जवाब है एम विश्वेश्वरैया. विश्वेश्वरैया दुनिया भर में मशहूर भारतीय इंजीनियर थे.

MPPSC के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे आवेदक.

इनके अलावा 12 और गलतियां थीं. ये सारे सही जवाब एक क्लिक पर हासिल किए जा सकते हैं. गूगल पर. लेकिन मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग का हिसाब अलग है. उसने कह दिया कि भैया हमारी कुंजी ही सही है. आपको गलत लगता है तो सबूत के साथ आपत्ति दर्ज कराओ. हर सवाल के लिए अलग-अलग. और सिर्फ एप्लिकेशन लिखने से काम नहीं चलेगा, साथ में एक आपत्ति का 100 रुपया भी लगेगा. अगर 15 सवालों पर आपत्ति दर्ज करानी है तो 1500 रुपए लगेंगे. माने जो बात गूगल मुफ्त में बता देगा, वो आयोग 1500 रुपए लेकर सुनेगा.

इसके बाद कटा बवाल. लोगों ने पैसे बिगाड़ कर आपत्तियां दर्ज कराईं. प्रदर्शन भी किए. इसके बाद आयोग ने 12 मार्च को एक और कुंजी जारी की. आयोग ने इसे अंतिम कुंजी कहा. इसमें 15 में से 10 सवालों के जवाब सुधारे गए और पांच को या तो डिलीट कर दिया गया या उन पर आई आपत्तियों को खारिज कर दिया गया.

आवेदकों की आपत्तियों के बाद MPPSC ने ‘अंतिम’ कुंजी जारी की थी. इसमें भी कई गलतियां थीं.

आयोग खुद ही ‘कंफ्यूज़ड’ है

लेकिन इसके बाद भी सबकुछ जगह पर नहीं आया. इसमें अलग-अलग सेट में एक ही सवाल के दो जवाब बता दिए गए थे. पेपर में पूछा गया था कि भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत राज्यपाल को विधानमंडल के ‘विश्रांति काल’ में अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है? प्रख्यापित करना माने जारी करना होता है. सेट C में ये सवाल 95वें और सेट D में ये सवाल 22वें नम्बर पर था. आयोग ने फाइनल आंसर शीट में सेट C वाले का जवाब ‘C’ बताया गया था. ‘C’ था अनुच्छेद 212. सेट D वाली कुंजी में जवाब ‘D’ बताया गया था. ‘D’ था अनुच्छेद 213. अब इससे ये कंफ्यूज़न पैदा हो गया कि आयोग अनुच्छेद 212 को सही मानता है कि 213 को.

इस सवाल का सही जवाब है अनुच्छेद 213. माने आयोग से C सेट की अंतिम कुंजी बनाने में एक बार फिर गलती हुई.

फिर चोरी से बदल दी ‘अंतिम’ सूची

12 मार्च को कुंजी जारी करते हुए आयोग ने अपने नोटिस में साफ लिखा था –

”यह अंतिम संशोधित उत्तर कुंजी प्रकाशित होने के पश्चात किसी भी प्रकार के अभ्यावेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे.”

लेकिन जैसे ही आयोग को अनुच्छेद 213 वाली गलती पर बन रही खबरों का पता चला और ये भी कि परीक्षा देने वाले इसे मुद्दा बना लेंगे, उसने 13 मार्च को चोरी से एक और ‘अंतिम’ संशोधित उत्तर कुंजी जारी कर दी.

ये चोरी यूं पकड़ में न आती. आयोग ने हूबहू नोटिस छापा था. वो भी बैक डेट. लेकिन जिनकी ज़िंदगी इस नोटिस पर टिकी थी, उन्होंने ये चोरी पकड़ ली. नए नोटिस में अनुच्छेद 213 वाली गलती चुपचाप सुधार दी गई थी. लेकिन नोटिस नंबर को पूरी तरह प्रिंट किया गया था. जबकि 12 मार्च को निकाले नोटिस में शुरुआत का ‘732’ हाथ से लिखा गया था.

13 की सुबह आयोग ने चोरी से एक और कुंजी निकाली. बैकडेट में.

जो गलतियां नहीं ही मानी आयोग ने

पेपर देने वालों ने जेब से 1,500 रुपए ढीले कर के 15 आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इन सब के सबूत भी दिए थे. लेकिन कुछ सवालों में आयोग अपने फैसले से नहीं डिगा. इनमें से सबसे ज़्यादा विवाद इस एक सवाल पर है –

”कालिका पुराण किस धर्म से संबंधित है?”

ज़्यादातर आवेदकों के मुताबिक इसका जवाब ‘शाक्त’ है. ज़्यादातर किताबें भी यही जवाब बताती हैं. लेकिन कुछ किताबों में इसका जवाब ‘जैन’ दिया है. अब आयोग इन कुछ किताबों के बल पर ‘जैन’ वाले जवाब पर अड़ा है. छात्रों की मांग थी कि इस सवाल पर आयोग अगर छात्रों की नहीं मानता, तो उसे कम से कम डिलीट ही कर दे. लेकिन आयोग ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

एक और सवाल था,

”मप्र का सर्वोच्च शिखर धूपगढ़ स्थित है?”

इसका सही जवाब है ‘सतपुड़ा श्रेणी’. लेकिन आयोग का मानना है था कि इसका जवाब ‘महादेव श्रेणी’ होना चाहिए. मध्य प्रदेश से आने वाले ज़्यादातर लोग इन दोनों श्रेणियों को एक ही मानते हैं. लेकिन इस परीक्षा की तैयारी करने वाले एक छात्र ने हमें तफसील से इनमें फर्क समझाया. ‘महादेव’ पहाड़ों का एक समूह है, लेकिन उन्हें सतपुड़ा श्रेणी का ही हिस्सा माना जाता है. तो अगर पेपर में श्रेणी पूछी है, तो जवाब सतपुड़ा ही होगा. लेकिन आयोग ने गलती मानकर जवाब सुधारने की जगह सवाल ही उड़ा दिया. माने डिलीट कर दिया.

पहली कुंजी आने के बाद से MPPSC के खिलाफ पूरे प्रदेश में एसडीएम को ज्ञापन दिए गए.

सवाल डिलीट करने, जवाब सुधारने और न सुधारने का खेल

ये खेल समझने के लिए एक उदाहरण ले लेते हैं. मान लीजिए एमपीपीएससी के पर्चे में चार ऑप्शन देकर आपसे ये सवाल पूछा जाए

”सूरज किस दिशा से निकलता है?”

A पूर्व
B पश्चिम
C उत्तर
D दक्षिण

अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सूरज असल में निकलता कहां से है. फर्क सिर्फ इस बात पड़ता है कि आयोग की कुंजी में कौनसा जवाब सही माना गया है. अगर आयोग इस सवाल का जवाब D माने, तो नंबर D पर निशान लगाने वाले को ही मिलेंगे.

अब अगर छात्र इसके खिलाफ सबूत सहित आपत्ति दर्ज कराएं, तो तीन चीज़ें हो सकती हैं –

1. अगर आयोग गलती मान ले, तो A को सही जवाब बताते हुए अंतिम कुंजी निकाली जाएगी. इससे होगा ये कि D पर निशान लगाने वालों के नंबर कट जाएंगे और A पर निशान लगाने वालों के नंबर बढ़ जाएंगे.

या

2. अगर आयोग सही जवाब तय न कर पाने की स्थिति में इस सवाल को ही डिलीट कर दे तो हर आवेदक को 1 नंबर मिल जाएगा. चाहे उसने टिक कहीं भी लगा दिया हो. चाहे तुक्का मारा हो.

या

3. अगर आयोग इस बात पर अड़ा रहे कि सूरज दक्षिण से ही निकलता है और इसी जवाब के साथ अगर अंतिम कुंजी जारी हो जाए, तो आपत्ति वालों के 100 रुपए बरबाद हो जाएंगे. जिन्होंने पूर्व पर टिक किया होगा, उन्हें सही जवाब देने की सज़ा मिलेगी और जिन्होंने दक्षिण का तुक्का लगाया होगा, उन्हें नंबर मिल जाएंगे.

मुख्यमंत्री और राज्यपाल के नाम दिए इन ज्ञापनों में आवेदकों ने कई मांगे की हैं. क्योंकि एमपीपीएससी की परीक्षाओं में लंबे समय से गड़बड़ रही है.

इस उदाहरण से साफ है कि आयोग आपत्तियों पर जिस तरह से निर्णय लेता है, उससे तय होता है कि फायदा किसे पहुंचेगा, मेहनत करने वाले आवेदकों को या फिर तुक्कड़ों कों. और यही एमपीपीएससी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के गुस्से की वजह भी है.

जब से पहली कुंजी जारी हुई है, तब से पेपर देने वाले आयोग के चक्कर काट रहे हैं. लेकिन आयोग लगातार छात्रों से बात करने से मना करता रहा. इसके बाद पूरे मध्य प्रदेश में अलग-अलग जगहों से मु्ख्यमंत्री और राज्यपाल के नाम ज्ञापन एसडीएम को सौंपे गए.

17 मार्च को इंदौर (जहां आयोग का मुख्यालय है) में एक रैली भी निकाली गई, जिसके बाद आयोग के परीक्षा नियंत्रक का एक छोटा सा बयान जारी हुआ कि आयोग ने बहुत सोच-समझ कर आंसर शीट तैयार की है, लेकिन फिर भी वो ये मामला आयोग के सामने विचार के लिए रखा जाएगा.

आवेदक पढ़ाई कब करेंगे, समय आंदोलनों में खर्च हो रहा है.

और आयोग के पास फोन उठाने का समय नहीं है

सवाल कर रहे आवेदकों को टालना एक बात है. लेकिन मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग इस मामले में लगातार मीडिया से बचता आया है. इस  पूरे मामले में आयोग का पक्ष जानने के लिए ‘दी लल्लनटॉप’ ने एक पूरी दोपहर आयोग की वेबसाइट पर दिए फोन नंबर मिलाए. आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष भास्कर चौबे का फोन मिला ही नहीं.  तो हमने आयोग के सदस्य राजेश मेहरा के दफ्तर में फोन घुमाया. यहां फोन लगा, लेकिन जवाब मिला कि साहब इंटरव्यू ले रहे हैं. आयोग के सचिव पवन कुमार शर्मा के दफ्तर में कहा गया कि साहब 5 बजे बात करेंगे, आप अपना नंबर और परिचय बता दीजिए. हमें कोई फोन नहीं आया. हमने दोबारा फोन किया तो जवाब मिला कि साहब अब भी व्यस्त हैं. आयोग के डिप्टी सेक्रेटरी दिनेश जैन के दफ्तर में फोन उठाया ही नहीं गया. हारकर हमने आयोग में परीक्षा नियंत्रक डीपी यादव के यहां फोन मिलाया. यहां कहा गया कि दिनेश जैन मीडिया से बात करेंगे. वही जैन साहब, जो फोन नहीं उठाते.

दूसरे राज्यों की तरह ही मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षाएं भी कमोबेश हमेशा गड़बड़ी के आरोपों में घिरी रहती हैं. पिछले ही साल मध्य प्रदेश में एमपीपीएससी परीक्षा में एक ही केंद्र से 17 आवेदकों के चुने जाने की खबर आई थी. ये सभी जैन थे. आयोग में परीक्षा नियंत्रक रहे (और अब डिप्टी सेक्रेटरी) दिनेश जैन और प्रभारी परीक्षा नियंत्रक मदनलाल गोखरू इसी समुदाय से आते हैं. एक साल के भीतर दूसरी बार एमपीपीएससी पर गंभीर लापरवाही (या घोटाला) के इल्ज़ाम लगे हैं. मध्य प्रदेश में व्यापमं खोटाले का भूत जब-तब खड़ा हो जाता है. ऐसे में एमपीपीएससी जैसी संस्थाएं युवाओं की नाराज़गी बढ़ा ही रही हैं. अब सरकार को इस नाराज़गी से कितना डर लगता है, वो आने वाले दिनों में मालूम चल जाएगा.