म.प्र. : परिवर्तन के भावांतर में फंसी भाजपा
 

भोपाल/

( न काहू से बैर – राघवेंद्र सिंह )
मध्यप्रदेश समेत तीन भाजपा शासित राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में साल के अंत तक चुनाव होने हैं इसलिए सत्ता और संगठन दोनों में कामकाज को लेकर उल्टी गिनती शुरू हो गई है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में सत्ता संगठन को लेकर पार्टी हाईकमान चिंतित है। चुनाव साल में संगठन पर कार्यकर्ताओं के साथ जनता का भी दबाव बढ़ता है। जब पार्टी सरकार में हो तो हालात और खराब हो जाते हैं। प्रदेश के हाल इसलिए भी खराब हैं क्योंकि भाजपा सरकार और संगठन दोनों के खजाने खाली हैं। जनकल्याण के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है तो चुनाव में काम कराने के लिए पार्टी के पास समर्पित कार्यकर्ताओं का टोटा है। जहां तक इवेंट का मामला है किराए के लोग और पैसा लेकर काम करने वाले कार्यकर्ता अलबत्ता  रोजनदारी पर मिल सकते हैैं। अभी तक प्रशासन के साथ भाजपा की इवेंट टीम मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सभाओं में यह धत्तकरम करती रही है। मगर मामला चुनाव का है ऐसे में समर्पित कार्यकर्ता और टीम वर्क की जरूरत सबसे ज्यादा रहती है। युद्ध और चुनाव के पहले अक्सर न तो घोड़े बदले जाते हैं और न लीडर।
भाजपा के साथ कांग्र्रेस भी कमोबेश बदलाव के बादलों से घिरी हुई है। कांग्र्रेस में अरुण यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से विदाई के गीत लंबे समय से गाए जा रहे हैैं। हाईकमान का झुकाव कभी जूनियर महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरफ दिखता है तो कभी पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ की तरफ। लेकिन कांग्र्रेस में एक और बड़े खिलाड़ी का आगमन अप्रैल में दिग्विजय सिंह के रूप में होने वाला है जो अपनी नर्मदा परिक्रमा पूरा करते ही राज्य के उन क्षेत्रों की परिक्रमा करेंगे जहां कांग्र्रेस हारती आई है। कुल मिलाकर भाजपा के साथ कांग्र्रेस भी परिवर्तन के भावांतर में उलझी हुई है। किसानों के लिए भावांतर एक पहेली की तरह है वैसे ही नेतृत्व में परिवर्तन का भावांतर पार्टी हाईकमान से लेकर कार्यकर्ता और उनके समर्थकों के लिए भी बड़ा सवाल बना हुआ है। सरकार कहती है भावांतर किसानों के लिए लाभकारी है दूसरी तरफ किसान और विशेषज्ञ कहते हैैं यह व्यापारी और अफसरों  की जेब भरने वाला है। इसी बात को भाजपा के नजरिए से देखा जाए तो कह सकते हैैं वर्तमान में हां में हां मिलाने वाला संगठन मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के लिए तो अच्छा है मगर चुनाव के नजरिए से यह पार्टी के लिए मुश्किल भरा है। लंबे समय से भाजपा में बदलाव की बात जोर पकड़ रही है। मगर अब लगता है कि वह निर्णायक दौर में है। अब परिवर्तन नहीं हुआ तो यह माना जाएगा कि जैसी भी टीम है उसी भरोसे चुनावी जंग लड़ी जाएगी। कमजोर प्रदर्शन हुआ या भाजपा की सरकार चौथी बार नहीं बनती है तो इसके दुष्परिणाम 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी को भुगतने पड़ेंगे।
भाजपा को दो बार बतौर प्रदेश अध्यक्ष सत्ता में वापसी कराने वाले नरेंद्र सिंह तोमर पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैैं। अंदरखाने की बात करें तो प्रदेश भाजपा के ये छोटे कद के बड़े ठाकुर राज्य में लौटने के इच्छुक नहीं हैैं। मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री के तौर पर उनका कद बड़ा हुआ है और कामकाज की दृष्टि से वे मोदी के भरोसेमंद बने हुए हैैं। ऐसे में तोमर बिगड़े संगठन और बदनाम होती शिव सरकार के बोझ को उठाने के लिए तैयार नहीं हैैं। हाईकमान उन्हें मध्यप्रदेश संभालने का आदेश भी दे सकता है मगर अभी उनके इनकार को इकरार में बदलने की कोशिश करने में लगा है। हालांकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की दौड़ में कैलाश विजयवर्गीय, सांसद राकेश सिंह, प्रहलाद पटेल, नरोत्तम मिश्रा, भूपेंद्र सिंह के नाम भी चर्चाओं में हैं। इसके अलावा प्रदेश महामंत्री बी.डी. शर्मा का नाम भी सुर्खियों में है। एक चौंकाने वाला नाम अजयप्रताप सिंह का भी बनाया जा रहा है जो हाल ही में राज्यसभा सदस्य बनें हैैं। कुल मिलाकर अध्यक्ष के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सहमति महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि अंत में उनका मत भी नरेंद्र सिंह तोमर के पक्ष में जाएगा। समझौता उम्मीदवार के रूप में अजय प्रताप सिंह भी हो सकते हैैं।
पार्टी में कहा जाता है कि कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवा, नारायणप्रसाद गुप्ता, सुंदरलाल पटवा के बाद कोई आदमकद शख्स नजर नहीं आते। नए नेताओं में पिछले दो विधानसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र सिंह तोमर जरूर गंभीर और प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे हैं। संगठन से लेकर सरकार तक में उनकी छवि है। हालत यह है कि 15 साल भी भाजपा सरकार में लोक बड़ी बड़ी बातें तो करते हैं मगर कार्यकर्ता और जनता के बीच भरोसेमंद चेहरा बनकर कोई उभर नहीं पाया है। भाजपा और कांग्र्रेस के समूचे हालात पर यह शेर सटीक है….
कोहनी पर टिके हुए लोग, टुकड़ों पर बिके हुए लोग
करते हैं बरगद की बातें, ये गमले में उगे हुए लोग

केबिनेट विस्तार का झुनझुना

मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में है। एेसे में क्षेत्रीय असंतोष दूर करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान केबिनेट विस्तार की बातें कर रहे हैं। इस विस्तार से विधायकों को मंत्री का पद तो मिल जाएगा मगर उनके हारने की संभावना बढ़ जाएगी। वजह ये है कि  मंत्री बनने के बाद विभाग को समझने में वक्त लगेगा तब तक चुनाव सिर पर आ जाएंगे इस हालत में नये नवेले मंत्री जी प्रदेश के लिए तो कुछ कर ही नहीं पाएंगे बल्कि अपने क्षेत्र की जनता को लाभ पहुंचाने की स्थिति में कम रहेंगे। क्योंकि अधिकारी चुनाव के कारण उनकी सुनेंगे नहीं और कार्यकर्ता और जनता की अपेक्षा होगी कि अब विधायक मंत्री जी बन गये हैं तो सारे काम पलक झपकते हो जाएंगे। हकीकत में एेसा हो नहीं पाएगा। इसलिए विस्तार में मंत्री पद विधायकों के लिए एक किस्म का झुनझुना साबित होगा और चुनाव हारे तो उनके खाते में पूर्व मंत्री का ओहदा जरूर रह जाएगा। इस अंतिम विस्तार में इंदौर के दो विधायक रमेश मेंदोला और सुदर्शन गुप्ता जरूर मंत्री बन सकते हैं। जो अब तक सुमित्रा ताई और कैलाश भाई की गुटबाजी में मंत्री नहीं बन पा रहे थे।