कर्नाटक में किंगमेकर के किंग बनने के आसार….जीत के लड्डुओं की मिठास फीकी -अमित शाह से करिश्में की उम्मीद

कर्नाटक के चुनाव नतीजों से पहले यह अनुमान लगाया जा रहा था कि दैवेगौडा की पार्टी और कुमार स्वामी किंगमेकर बनकर उभरेंगे. पर पल-पल बदलते राजनीतिक हालात किंगमेकर के सीधा किंग बनाये जाने का इशारा दे रहे हैं.देशभर में इस प्रकार बदलते हालात के कारण भाजपा में जीत के लिये बंट रहे लड्डुओं का स्वाद फीका हो रहा है. देखना है कि अमित शाह की कौन सी करिश्माई इन लड्डुओं की मिठास बढा.सकती है

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बदलते रुझानों के बीच कांग्रेस अभी हिम्मत नहीं हारी है. कांग्रेस इस समय रुझानों में बीजेपी के बाद दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी बनती दिख रही है. बीजेपी बहुमत से थोड़ा पीछे रहती दिख रही है और कांग्रेस कर्नाटक में कम से कम एक बार सरकार बनाने की कोशिश करना चाहती है. ऐसा करके कांग्रेस न केवल कर्नाटक में अपने ढहते किले को बचाने का प्रयास कर रही है बल्कि मौजूदा राजनीतिक हालातों में वह मोठा भाई अमित शाह को उन्हीं के राजनीतिक हथियार से मात देना चाहती है.

कांग्रेस की राजनीति के धुरंधर नेता पर्दे के पीछे सक्रिय हो गये हैं. सोनिया गांधी ने गलामनवीँ आजाद , अशोक गहलोत को सक्रिय किया वहीं दिल्ली में भीतरखाने दिग्विजय सिंह सहित ऐसे बहुत सारे नेता भाजपा की सरकार बनने देने से रोकने के लिये सक्रिय हो चुके हैं.

हालांकि लगता नहीं है कि देश की राजनीति में चाणक्य समझे जा रहे भाजपाध्यक्ष अमित शाह और उनके सहयोगी कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के इस सुअवसर को गंवां देंगे परन्तु यह भी साफ है कि बाजी पूरी तरह से किसी एक के हाथ में नहीं है.

कर्नाटक में मौजूद कांग्रेस के सीनियर नेता गुलाम नबी आजाद ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा है कि उनकी देवगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी दोनों के साथ फोन पर बात हुई है. उन्होंने बताया कि जेडीएस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया है. आजाद ने कहा कि जेडीएस सरकार चलाएगी. उन्होंने बताया कि आज शाम को ही गवर्नर से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया जाएगा. उन्होंने कहा कि राज्यपाल से कहा जाएगा कि हमारे पास दोनों को मिलाकर बीजेपी से ज्यादा सीटें हैं.

इधर सोनिया गांधी ने कर्नाटक में मौजूद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को फोन करके पहले ही कह दिया था कि वे जेडीएस प्रमुख एचडी देवगौड़ा से बात करें. कांग्रेस और जेडीएस मिलकर सरकार बनाने की सूरत में हैं, लेकिन बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आती है तो सरकार बनाने और बहुमत साबित करने का पहला न्योता उसे ही मिल सकता है.

जानकारी के मुताबिक यूपीए की प्रमुख सोनिया गांधी ने गुलाम नबी आजाद से कहा है कि वह तुरंत सिद्धारमैया से बात करें. कांग्रेस की ओर से देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी को सीएम बनाने का प्रस्ताव दिया जा सकता है. हालांकि, कांग्रेस और जेडीएस के बीच में बातचीत देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी की वजह से फेल हो सकती है.भाजपा की ओर से यदि जनता दल सेक्यूलर को साथ लेने की बात कही जा रही है वह मुकाम पर पहुंचेगी इसमें संदेह हैं क्योंकि, जेडीएस की ओर से अभी बीजेपी को सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं.

किंगमेकर की भूमिका की कल्पना करते करते कुमरस्वामी किंग बनने की स्थिति में आ गये हैं . यही राजनीति का नियम हे.

 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से अब तस्वीर ज्यादा साफ होती नजर आ रही है. बीजेपी बहुमत से मात्र कुछ सीट दूर रुकती नजर आ रही है. इस बीच, बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस ने जो बड़ा दांव खेल दिया है. कांग्रेस ने जेडीएस नेता कुमारस्वामी को सीएम बनने पर बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया है. नतीजों से पहले  जेडीएस को जहां किंगमेकर बताया जा रहा था, लेकिन अब कुमारस्वामी सीधे किंग बनते नजर आ रहे हैं.

224 सीटों वाली राज्य विधानसभा की 222 सीटों पर पड़े मतों की गिनती मंगलवार सुबह 8 बजे से शुरू हुई थी . शुरुआत में कांटे की टक्कर दिखी जो बाद में भाजपा को स्पष्ट बहुमत की ओर ले जा रही थी अंत में  बीजेपी ने 100 का आंकड़ा तो पार किया. लेकिन बहुमत से जरा सी दूर ही रही. ऐसे वक्त में कांग्रेस ने जेडीएस को आगे कर सरकार बनाने और बीजेपी को रोकने का दांव खेल दिया.

राजनीति के पंडित त्रिशंकु विधानसभा का अनुमान लगा रहे थे

कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने से दो दिन पहले ही सियासी गोटियां फिट की जाने लगी थीं. बीजेपी-कांग्रेस दोनों जहां एक तरफ बहुमत का दावा करते रहे, वहीं जेडीएस का सहयोग लेकर सरकार बनाने के प्लान-बी पर भी काम शुरू हो गया. क्योंकि एग्जिट पोल त्रिशंकु विधानसभा का इशारा कर रहे थे और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में जेडीएस की भूमिका काफी अहम हो जाती. ऐसे में जेडीएस के कुमारस्‍वामी किंगमेकर साबित होते.

दलित को मुख्यमंत्री बनाने की बात कह कर कुमारस्वामी को लुभाया.

बीते रविवार को ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दलित सीएम का कार्ड खेल दिया. सिद्धारमैया ने ऐलान कर दिया कि अगर पार्टी दलित सीएम बनाती है तो वह अपनी दावेदारी छोड़ सकते हैं. उधर, जेडीएस के प्रवक्ता ने भी इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी. कांग्रेस पार्टी के दो बड़े नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत संभावित गठबंधन पर बात के लिए नतीजों से पहले ही सोमवार को ही बेंगलुरु पहुंच गए. जब स्थिति त्रिशंकु विधानसभा की बन रही थी तभी दिल्ली से सोनिया गांधी का फोन गुलाम नबी आजाद को गया. सोनिया ने देवगौड़ा से बात कर जेडीएस को बाहर से समर्थन का ऐलान करने को कहा. यहीं से कर्नाटक चुनाव की तस्वीर बदल गई.दैवगौडा और उनका परिवार काफी भाग्यशाली रहा है जो राजनीति में अपने योगसिद्ध होने पर बिना किसी अतिरिक्त प्रयत्नों के सत्ता में प्रभावी पद प्राप्त करते रहे हैं. ऐस संयोग इनके साथ एक नहीं अनेक बार हुआ है.

जेडीएस का नता पुराना है कांग्रेस के साथ

ये बात तो चुनावी ही समझी जायेगी कि चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और जेडीएस के बीच बयानों के तीखे तीर चले, लेकिन दोनों दल स्वाभाविक सहयोगी नजर आते हैं. जेडीएस की स्थापना एचडी देवगौड़ा ने 1999 में जनता दल से अलग होकर की थी. जनता दल की जड़ें 1977 में कांग्रेस के खिलाफ बनी जनता पार्टी से शुरू होती है. इसी में से कई दल और नेताओं ने बाद में जनता दल बनाई. कर्नाटक में जनता दल की कमान देवगौड़ा के हाथों में थी. उन्हीं के नेतृत्व में जनता दल ने 1994 में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई और देवगौड़ा मुख्यमंत्री बने. कुमारस्वामी को यदि भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री बनाया गया तो यह प्रस्ताव उनके लिये विचारणीय तो होगा परन्तु उसमें वे सोचसमझकर आगे बढेंगे लेकिन व्यक्तिगत रूप से कुमार स्वामी भाजपा के ज्यादा निकट सोचते हैं. ये बात भी शीशे की तरह साफ है कि अमित शाह और भाजपा की कोर टीम किसी भी हालत में सरकार बनानें की पूरी कोशिस करेगी. पर इस खेल में किंगमेकर एक बार किंग बन सकता है.

 दो साल के बाद 1996 में जनता दल के नेता के रूप में कांग्रेस के समर्थन से एचडी देवगौड़ा 10 महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे. इससे पहले अगर जाकर देखें तो 1953 में देवगौड़ा ने अपनी सियासत की शुरुआत भी कांग्रेस नेता के रूप में ही की थी, लेकिन पहली बार वो निर्दलीय के तौर पर विधायक बने थे. फिर इमरजेंसी के दौरान जेपी मूवमेंट से जुड़े और जनता दल में आ गए.

 कर्नाटक में जेडीएस अलग अस्तित्व में है तो केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का हिस्सा. जेडीएस, कांग्रेस और बीजेपी दोनों के साथ मिलकर सरकार बना चुकी है. 1999 के विधानसभा चुनाव में जेडीएस को 10 सीटें, जबकि 10.42 फीसदी वोट हासिल हुए थे. 2004 में 59 सीट और 20.77 फीसदी वोट. 2008 में 28 सीट और 18.96 फीसदी वोट. 2013 में 40 सीट और 20.09

देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी राज्य में बीजेपी के समर्थन से भी सरकार चला चुके हैं. 2004 के चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई थी और कांग्रेस के धरम सिंह सीएम बने. लेकिन 2006 में जेडीएस गठबंधन सरकार से अलग हो गई. फिर बीजेपी के साथ बारी-बारी से सत्ता संभालने के समझौते के तहत कुमारस्वामी 2006 में मुख्यमंत्री बने. लेकिन उसके अगले ही साल सत्ता बीजेपी को सौंपने की जगह कुमारस्वामी ने अक्टूबर 2007 में राज्यपाल को इस्तीफा भेज दिया, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा. हालांकि, बाद में जेडीएस ने बीजेपी को समर्थन का ऐलान किया. इस समझौते के तहत 12 नवंबर 2007 को बी. एस. येदियुरप्पा 7 दिन के लिए सीएम बने थे. यानी बीजेपी के साथ जेडीएस का गठजोड़ कभी मजबूत नहीं हो पाया.

भारतीय जनता पार्टी और जनता दल सेक्यूलर के अलग-अलग हुऐ रास्ते

2008 के चुनाव में जेडीएस-बीजेपी अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे और बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. 2013 में कांग्रेस जीती और सिद्धारमैया सीएम बने. 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद सेकुलर पॉलिटिक्स की चर्चा चली तो जेडीएस ने अपनी सियासत में फिर बदलाव किया.

14 अप्रैल 2015 को जेडीएस और 5 अन्य दलों जेडीयू-आरजेडी-सपा-इनेलो और सजपा ने बीजेपी विरोधी न्यू जनता पार्टी परिवार गठबंधन का ऐलान किया. लेकिन बाद में बिहार में आरजेडी-जेडीयू अलग हो गए और जनता परिवार के इस गठबंधन को लेकर भी कोई ठोस पहल सामने नहीं आई.

बसपा, लेफ्ट फ्रंट और ओवैसी की पार्टी जिसके साथ अभी जेडीएस चल रही है वे बीजेपी के धुर विरोधी माने जाते हैं. ऐसे में बीजेपी के साथ जाना जेडीएस का एकदम सियासी यू-टर्न माना जाएगा. 2019 का आम चुनाव इतना करीब है और शायद ही जेडीएस अपनी रणनीति में इतना बड़ा बदलाव करे. येडुरप्पा की किस्मत सत्ता के मामले में बहुत अच्छी भी नहीं समझी जा सकती है क्योंकि वे तो लगभग मुख्यमंत्री के पद के लिये भाजपा के स्पष्ट प्रत्याशी रहे है और चुनाव जीतने के बाद उनके शपथ लेने पर किसी को कोई संदेह भी नहीं था. किन्तु बदलते राजनीतिक समीकरणों में उनका मुख्यमंत्री बनना संदिग्ध हो गया है.

दम यानि दलित+ मुस्लिम समीकरण का दम

येडुरप्पा जीत गये हैं पर इनके राजयोग हमेशा जरा कमजोर ही होते हैं . भाजपा की कर्नाटक में वापिसी और दक्षिण में भाजपा के लिये द्वार खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका के वावजूद उनके राजतिलक में अ भी बाधा आ गय़ी है

कर्नाटक में दलित समुदाय का 19 फीसदी वोट भी काफी मायने रखता है. दलित मतदाता सबसे ज्यादा है. हालांकि, इसमें काफी फूट है, लेकिन बसपा के साथ गठबंधन कर जेडीएस इस वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए थी. चुनाव में दलित वोट लेकर अभी जेडीएस बीजेपी से दूरी बनाए रखना चाहेगी क्योंकि फिलहाल दलित समुदाय में एससी/एसटी एक्ट में बदलावों को लेकर बीजेपी के प्रति गुस्सा है और जेडीएस बीएसपी के साथ मिलकर चुनाव भी लड़ी थी. इसके अलावा कांग्रेस के साथ-साथ जेडीएस की भी पकड़ मुस्लिम वोट बैंक पर है. चुनाव बाद बीजेपी के साथ अगर जेडीएस गई तो 2019 के लिए उसकी राह फिर मुश्किल हो जाएगी. इसलिए भी कांग्रेस और जेडीएस का साथ आना स्वाभाविक था.

कर्नाटक में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. बीजेपी बहुमत के जादुई आंकड़े को छूने से कुछ सीटें पीछे है. राज्य में चुनाव के नतीजों के देखें तो त्रिशंकु विधानसभा की भी एक संभावना बन रही है. अगर ऐसा हुआ तो जेडीएस किंग मेकर की भूमिका में नजर आ सकती है. यही नहीं, कांग्रेस के पास भी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने का एक मौका होगा.

कर्नाटक में 222 सीटों में से बीजेपी को 105 सीटें मिली . इस तरह से उसे सरकार बनाने के लिए कम से कम 6 सीटों की जरूरत और होगी. कांग्रेस 72 तो जेडीएस 41 सीटों पर आगे है. अन्य 2 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं.  बीजेपी को सरकार बनाने के लिए निर्दीलीय विधायकों से काम नहीं चलेगा. इसके लिए जेडीएस का समर्थन पार्टी को हासिल करना होगा.

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस और जेडीएस मिलकर सरकार बना सकते हैं. इसके अलावा दूसरा रास्ता ये है कि जेडीएस को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस बाहर से समर्थन दें. कांग्रेस अगर कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनने का ऑफर देती है, तो ऐसी हालत में जेडीएस का बीजेपी के साथ जाना मुश्किल हो जाएगा. कांग्रेस इस फॉर्मूले के जरिए हारी बाजी जीत सकती है.

हालांकि  भारतीय जनता पार्टी जेडीयू सेक्यूलर के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश करेगी, लेकिन मुख्यमंत्री जैसा पद पार्टी कभी नहीं छोड़ेगी. यही वजह है कि जेडीएस के बीजेपी के बजाय कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने के ज्यादा साफ हैं.गौरतलब है कि 2004 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनाकर उभरी थी. बीजेपी को 79, कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं. इसके बावजूद बीजेपी कर्नाटक में सरकार नहीं बना सकी. तब भी कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई थी. एक बार कर्नाटक की राजनीति उसी मुहाने पर फिर खड़ी हो सकती है.कर्नाटक चुनाव में वैसे तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. लेकिन अभी भी वो जादुई आंकड़े 112 से 4 कदम दूर है. ऐसे में सरकार बनाने के लिए बीजेपी की राह भी आसान नहीं है.

दरअसल अगर कांग्रेस+जेडीएस के आंकड़े 112 तक पहुंच जाते हैं तो फिर बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस कुमारस्वामी सरकार बनाने फॉर्मूले पर अपनी ताकत झोंक देगी. पहला कांग्रेस चाहेगी कि सभी गिले-शिकवे भुलाकर जेडीएस उसे समर्थन कर दे. इस कड़ी में अगर जेडीएस किसी कांग्रेसी के नाम पर असहमत होती है तो कांग्रेस बिना देर किए जेडीएस की पसंद वाले कांग्रेसी पर मुहर लगा देगी.मल्लिकार्जुन खडगे का नाम वैसे तो कहीं नहीं है पर बदलते राजनीतिक हालात में इनके नाम पर विचार और सहमति बनाने की कोशिश की जा सकती है.

दूसरा फॉर्मूला ये है कि जेडीएस भी करीब 40+ सीटें जीतती दिख रही है, और कांग्रेस पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार कमजोर हुई है. ऐसे में अगर जेडीएस अपना मुख्यमंत्री का दावा पेश करती है तो कांग्रेस इस पर भी विचार कर सकती है. क्योंकि भले ही सीएम की कुर्सी जेडीएस के पास होगी, लेकिन कांग्रेस अपनी रणनीति पर कामयाब रहेगी. क्योंकि कांग्रेस हर हाल में बीजेपी को सत्ता से दूर रखना चाहती है.

हालांकि कांग्रेस सोमवार से ही कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए प्लान-बी में जुट गई है. इसी कड़ी कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत सोमवार को ही बेंगलुरु पहुंच गए. कहा जा रहा है कि कांग्रेस जेडीएस प्रमुख और पूर्व प्रमं एचडी दैवगौडा के साथ संपर्क में है. लेकिन कांग्रेस को सरकार बनाने या फिर सरकार में भागीदार बनने का मौका तभी मिलेगा, जब बीजेपी अपने दम सरकार नहीं बना पाएगी. इसके अलावा अगर जेडीएस बीजेपी को समर्थन देने से मना कर दे. लेकिन फिलहाल जब तक पूरे आंकड़े नहीं आ जाते तब तक केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं.

इस बीच बीजेपी ने भी प्लान-बी पर भी काम करना शुरू कर दिया है. अगर बीजेपी बहुमत से कुछ दूर रहती है तो पहले निर्दलीय विधायकों को साथ लेकर सरकार बनाने की कोशिश होगी. लेकिन आंकड़े निर्दलीय विधायकों को साथ लेने पर भी नहीं पूरे होने की स्थिति में  जनता दल सेक्यूलर साथ लाना जरूरी हो जाएगा. इसी कड़ी में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात के बाद केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बेंगलुरु के लिए रवाना हो गए हैं. वैसे बीजेपी ने पहले की संकेत दे दिया था कि जेडीएस से उसे परहेज नहीं है.

मोदी लहर ?

कर्नाटक चुनाव में बीजेपी को मिलती बढत से एक बार फिर से यह साफ हो गया है कि चार साल बाद भी मोदी लहर कम नहीं हुई है. नरेंद्र मोदी की लहर बीजेपी को 2014 में केन्द्र की सत्ता सौंपने के बाद भी कायम है. देश के 29 राज्यों में से 21 राज्यों पर बीजेपी सत्ता पर काबिज होने जा रही है यानी 21वां राज्य कर्नाटक भी अब बीजेपी के पास जा रहा है. एक बार फिर मोदी लहर ने कमाल दिखाया है और नतीजा कांग्रेस को अपना सबसे मजबूत किला (कर्नाटक) ढ़हते हुए देखना पड़ रहा है.

कांग्रेस को यह शिकस्त कर्नाटक के उन सभी छह राजनीतिक जोन में मिली है, जिनमें से कम से कम तीन जोन को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है. मंगलवार दोपहर तक वोटों की गिनती और रुझानों से साफ है कि राज्य में बीजेपी की सरकार बनने जा रही है. बीजेपी लगभग 121 सीटों पर जीत की दिशा में आगे है और वहीं कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव की अपेक्षा लगभग आधी सीटों पर हार का सामना करना पड़ रहा है. भारतीय जनता पार्टी को कर्नाटक सभी जोन यानी ओल्ड मैसूर, कोस्टल-कर्नाटक, बेंगलुरु-कर्नाटक, मुंबई-कर्नाटक, सेंट्रल कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक में शानदार जीत मिली, तो दूसरी ओर कांग्रेस इन जोन में खराब प्रदर्शन के साथ-साथ कोस्टल कर्नाटक, सेंट्रल-कर्नाटक, हैदराबाद-कर्नाटक और ओल्ड मैसूर के अपने गढ़ को गंवाना पड़ा.

 राज्य में  सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सत्ता में थी. कांग्रेस पार्टी की कमान राहुल गांधी को मिलने के बाद हुए ये चुनाव बेहद अहम था. कांग्रेस की कवायद थी कि पार्टी के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में होने वाला पहला चुनाव किसी भी कीमत पर जीता जाए. यही वजह रही कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फरवरी 2018 में ही कर्नाटक चुनाव प्रचार का बिगुल फूंक दिया था. फरवरी से लेकर मई तक राहुल गांधी ने राज्य की 222 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया.

तीन दर्जन से अधिक रैलियां और सैकड़ों कॉर्नर मीटिंग के जरिए राहुल गांधी ने बीजेपी के लिए कर्नाटक को सबसे मुश्किल चुनाव में तब्दील कर दिया. राहुल गांधी के इस आक्रामक तेवर के उलट बीजेपी ने पोलिंग से महज 12 दिन पहले एक मई को प्रधानमंत्री का कर्नाटक दौरा रखा. एक मई से 12 मई तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य का तूफानी दौरा किया और करीब दो दर्जन रैलियों को संबोधित किया. हालांकि इस दौरान कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री से कन्नड़ भाषा में पांच सावल पूछते हुए उनकी रैलियों के असर को खत्म करने की कोशिश की.

( न्यूजबिरयानी समाचार सेवा )